किस्सा कहानी (Kissa Kahani): ज्ञानी व्यक्ति की मित्रता

एक समय की बात है एक गाँव मे निहाल नाम का एक साधारण व्यक्ति रहता था वो बहुत ही सीधा और शांत स्वभाव का व्यक्ति था उसमे किसी प्रकार का छल कपट नहीं था। उसकी पत्नी उसके सीधेपन के कारण उसको पसंद नहीं करती थी और किसी प्रकार उससे पीछा छुड़ाना चाहती थी। और गाँव के ही एक व्यक्ति से दूसरी शादी करना चाहती थी। उसकी पत्नी ने एक उक्ति सोची और निहाल को 400 रुपये देकर शहर जाने को बोला और कुछ काम धंधा ढूँढने को बोला। उसकी पत्नी को पूरा विसवास था कि वो शहर मे जाकर अपने सीधेपन के कारण जरूर किसी मुश्किल मे पड जाएगा और उसे उससे मुक्ति मिलेगी। निहाल उसकी चाल को नहीं समझ पाया और 400 रुपये लेकर शहर की ओर निकाल पड़ा।

रास्ते मे उसकी मुलाक़ात एक मिसर नाम के व्यक्ति से हुई जो बहुत ही बुद्धिमान और समझदार व्यक्ति था। निहाल ने मिसर से कुछ बोलने को कहा जिससे रास्ता कट जाये। जिसपर मिसर ने कहा मै फालतू बोलता नहीं अगर मुझे एक बात बोलने के 100 रुपये दो तो मै एक बात बोलूँगा। इस पर निहाल ने 100 रुयपये दिये और मिसर से बोलने को कहा। 100 रुपये लेकर मिसर ने पहली बात बताई कि जहां 4 लोग कुछ बोले तो तो उस बात को अवश्य मान लो। उसके बाद निहाल ने कुछ देर बाद 100 रुपये और देकर मिसर को बोलने को कहा इस बार मिसर ने कहा, कभी भी नदी मे स्नान घाट छोडकर ही करो। कुछ समय बीतने के उपरांत निहाल ने सोचा 200 रुपये बचे है इससे न तो शहर मे कुछ काम हो पाएगा तो क्यों न मिसर को देकर दो और बाते पुच्छते है। जिसपर मिसर ने दो बाते और बताई पहली कभी भी नाव मे सबसे पहले बैठो और सबसे आखरी मे ही उतरो। और दूसरी अपने मन का भेद कभी भी पत्नी को नहीं बताना। आगे चल कर मिसर अपने गंतव्य पर पहुँच गया और जाते जाते निहाल से बोला मित्र कभी भी मेरी जरूरत पड़े तो मुझे जरूर याद करना। और दोनों अपने अलग अलग रास्ते पर निकाल पड़े। 

 आगे निहाल को चलते हुए बहुत रात हो गई थी उसे रास्ते मे 4 चोर मिले और उन्होने उसे धमकाते हुए अपना चोरी किया हुआ सामान की पोटली उसे नदी के किनारे छिपाने को बोला जिसे चोर सुबह उठा लेते इसपर निहाल को मिसर की काही पहली बात याद आ गई कि 4 लोगो की बात को मना मत करना और निहाल ने चोरो की दी पोटली लेली और नदी की तरफ चल पड़ा। उसे उस पोटली से कुछ खनखनाने की आवाज आई और उसने देखा तो उसमे बहुत सारा सोना इत्यादि था उसने उसमे से आधा सामान रख लिया आगे चलते हुए सुबह हो गई और उसने स्नान करके भोजन करने की सोची और उसे मिसर की दूसरी बात याद आ गई और घाट छोडकर वो स्नान के लिए आगे बढ़ा जहा झाड़ियो मे उसे और कुछ आभूषण मिले। इसके बाद वो सोचा कि अब कुछ कमाने की आवश्यकता नहीं और पुनः नदी पार करके घर वापस आने की सोचा और मिसर के कहे अनुसार वो नाव मे सबसे पहले बैठा और आखिर मे उतरने लगा तभी उसे एक पोटली और मिली और उसको लेकर खुशी खुशी घर की तरफ बढ्ने लगा। रास्ते मे उसे अपने गाँव के बाहर एक कुआं दिखा जिसमे तरबूज लगा हुआ देखा और सोचा अगर किसी से शर्त रखू कि कुएं मे तरबूज दिखाओ तो वो शर्त जीत जाएगा और वो सोचते सोचते खुशी मन से अपने घर आ गया और पत्नी को सभी सामान देते हुए अगले दिन शर्त से 1000 रुपये और कमाने के बारे मे बताया। जिसपर उसकी पत्नी ने पूछा आखिर क्या शर्त लगाओगे जिससे 1000 रुपये मिलेंगे। और मिसर की बताई चौथी बात न मानते हुए निहाल ने अपना भेद अपनी पत्नी को बताया और सुबह का इंतज़ार मे सो गया।

निहाल की पत्नी ने शर्त की बात को सुनकर एक चाल चली जिसमे उसने अपने प्रेमी से निहाल को शर्त लगाने को मना लिया। और अपने प्रेमी को सब कुछ बता कर बोला कि निहाल से शर्त जीतने के बदले ये मांगना जिस पर तुम हाथ रखोगे वो चीज तुम्हारी और तुम मुझ पर हाथ रख देना। और सुबह हुई और कहे मुताबिक निहाल ने अपनी पत्नी से शर्त राखी और हार गया जिसके बदले उसने उसकी पत्नी पर हाथ रखने की बात काही जिसपर निहाल को मिसर की काही अंतिम बात याद आई कि जब भी मेरी जरूरत हो मुझे याद करना। और निहाल ने 4 दिन बाद शर्त पूरी करने की बात कहकर मिसर की तलाश मे निकाल पड़ा। मिसर के शहर मे पहुँचकर उसने मिसर से अपनी सारी बात बताई इसपर मिसर ने कहा कि कल सुबह वो उसके साथ उसके गाँव चलेगा और आज की रात निहाल को उसके घर ही रुकने को बोला और बोला अभी वो कुछ काम से बाहर जा रहा है और उसके मोहल्ले के लोग सही नहीं अतः जबतक वो आ ना जाये उसे बाहर निकालने से मना किया। 

निहाल मिसर की बात को नहीं माना और अपना जूता बनवाने के लिए मोची के पास गया और बोला कि उसका जूता बना दे और वो मोची को खुश कर देगा। मोची के जूता बनाने के बाद निहाल ने उसे चवन्नी दिया उसे बोला मुझे पैसे नहीं दो मुझे खुश करो जैसा तुमने बोला था। निहाल बुरा फंस गया। तभी वहाँ से मिसर वापस आ रहा था उसने कहा मैंने बोला था बाहर मत आना लेकिन माने नहीं अब तुम घर चलो मै मोची को खुश करके आता हूँ। और मिसर ने एक ढ़ोल बजने वाले को कुछ पैसे दिये और बोला जब तक मोची खुश न हो जाये तब तक ढ़ोल बजाता रहे। और ढ़ोल वाला ढ़ोल बजने लगा जिस पर मोची तंग होकर ढ़ोल वाले को मना करने लगा इसपर ढ़ोल वाले ने बोला जब तक आप खुश नहीं होंगे तब तक मै बजता रहूँगा। दुखी होकर मोची ने बोला वो और उसका परिवार सब खुश हो गए कृपया ढ़ोल बजाना बंद करें। और इस तरह मोची के मामला सुलझा। 

सुबह हुई मिसर ने निहाल से बोला मै तैयार होकर आता हूँ उसके बाद उसके गाँव चलेंगे। इतने मे निहाल ने हजामत कराने की सोची और मोहल्ले की नाई की दुकान पर पहुंचा और नाई से हजामत बनाने को बोला और मूल्य पूछा। नाई ने बोला कुछ दे देना निहाल हजामत बनवाने बैठ गया। और हजामत बनने के बाद पैसे देने लगा नाई ने बोला मैंने तो कुछ मांगा था तो मुझे कुछ ही चाहिए। निहाल दुबारा बुरा फंस गया। तभी मिसर आ गया और सारा मामला जानकार बोला कि मै नाई को कुछ दूंगा लेकिन उससे पहले उसके लिए कुछ खाने को देगा। और उसने एक पात्र मे दही लिया और उसमे कोयला का एक टुकड़ा दाल दिया और नाई से बोला पात्र मे रखा दही खा ले नाई ने पात्र देखा और बोला इसमे कुछ पड़ा है। इसपर मिसर ने बोला तुम्हें कुछ चाहिए था अब लेलों। और फिर निहाल और मिसर उसके गाँव की ओर चल दिये। 

गाँव पहुँचकर मिसर ने देखा निहाल की पत्नी उसका ही इंतज़ार कर रही थी और अपने प्रेमी के पास जाने को आतुर थी। तभी मिसर ने निहाल से एक सीढ़ी मंगाई और उसकी पत्नी को सीढ़ी पर चड़कर छज्जे पर बैठने को बोला और निहाल को उसके प्रेमी को बुलाने को कहा उसका प्रेमी बड़ी ही प्रसन्नता के साथ आया और बोला अब मै तुम्हारी जिस भी चीज को पहले छु लूँगा वो चीज मेरी हो जाएगी। मिसर ने भी बोला हाँ अगर निहाल ने ऐसा वादा किया है तो वो अवश्य पूरा करेगा। और निहाल की पत्नी का प्रेमी बड़े ही उत्साह के साथ सीढ़ी चड़ने लगा। तभी मिसर ने उसे रोक दिया और बोला तुमने बोला था तुम निहाल की जो चीज पर हाथ पहले रखोगे वो तुम्हारी होगी तो तुमने निहाल की सीढ़ी पर पहले हाथ रखा तो अब सीढ़ी तुम्हारी हुई अब इसे लेकर जाओ। इस प्रकार प्रेमी अपना मुंह लटकाकर वापस चला गया। और निहाल की पत्नी को भी अपनी गलती पर पछतावा हुआ। और दोनों से मिसर को धन्यवाद किया और निहाल और उसकी पत्नी खुशी खुशी साथ रहने लगे और निहाल की मिसर से मित्रता और अटूट हो गई। 

 

शिक्षा

इस कहानी से हमे ये शिक्षा प्राप्त होती है कि हमारी मित्रता अगर किसी ज्ञानी से हो तो वो हमारी हर मुश्किल वक्त मे काम आती है। और निहाल की पत्नी की मित्रता एक छली और अज्ञानी व्यक्ति से होती है और वो अपना हित और अहित भी नहीं सोच पाती। हमे कभी भी मित्रता किसी व्यक्ति के धन वैभव इत्यादि को न देखकर ऐसे व्यक्ति से करना चाहिए जो ज्ञानी हो जिसकी बुद्धिमता हमे हर मुश्किल वक्त से बचा सके क्योंकि बुद्धि और ज्ञान ऐसी अमपट्टी है जो कभी भी नष्ट नहीं हो सकता और मुश्किल से मुश्किल वक्त मे भी साथ देता है और हमे उस मुश्किल वक्त से बचाता है। एक और महत्वपूर्ण शिक्षा ये मिलती है की मित्र मिसर जैसा होना चाहिए जो हर मुश्किल वक्त मे अपना स्वार्थ न देखते हुए अपने मित्र का साथ देता है।

||इति शुभम्य||

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