गुरु पुर्णिमा (Guru Purnima) विशेष- गुरु ज्ञान का दाता, गुरु ही पथ प्रदर्शक

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष।।

उपरोक्त कबीर दास जी की प्रसिद्ध दोहा गुरु का सम्पूर्ण व्याख्या करती है। और ये भी बताती है हमारे जीवन में एक गुरु का क्या महत्व है। गुरु की उपयोगिता के प्रति हमारे द्वारा दिये गए धन्यवाद के रूप में हम प्रति वर्ष गुरु पुर्णिमा पर्व के रूप में मानते है। प्रति वर्ष आषाढ़ मास की पुर्णिमा के दिन हम इस पर्व का आयोजन करते है इस वर्ष 05 जुलाई 2020 को यह पर्व का आयोजन करने का मुहूर्त है। तो आइये जानने का प्रयास करते है कि गुरु और उनके लिए मनाए जाने वाले पर्व गुरु पुर्णिमा के बारे में।

गुरु का अर्थ-

सर्वप्रथम गुरु शब्द के व्याकरणिक अर्थ की बात करे तो गुरु शब्द तो धातु से मिल कर बना हुआ है। जिसमे प्रथम है गु धातु जिसका अर्थ होता है अंधकार, और द्वितीय है रू धातु जिसका अर्थ होता है प्रकाश। अतः गुरु का शाब्दिक अर्थ है। वह व्यक्ति या जीव जो हमे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाये उसे गुरु कहते है। यहाँ अंधकार से तात्पर्य अज्ञानता रूपी अंधकार से है तथा प्रकाश का अर्थ ज्ञान रूपी प्रकाश से है। जब हमे किसी से जीवन आदर्शो, विवेकशीलता, आध्यात्म इत्यादि के रूप में ज्ञान प्राप्त होता है उसे ही गुरु के रूप में देखा जाता है।

गुरु ही असली पथ-प्रदर्शक-

हम जन्म लेते ही सब कुछ सीख कर नहीं आते। इस संसार में अनुभव के आधार पर चीजे सीखते है। जीवन के हर मोड पर हमे किसी मार्ग दर्शक की आवश्यकता होती है। जो हमे उचित या अनुचित का साक्षात्कार कराता है। जो हमे बताता है कर्मो के गुण अवगुण, जीवन आदर्श के बारे में जीवन के विकारों और जीवन के मुख्य उद्येश्य के बारे में। उसे ही हम गुरु के रूप में देखते है। गुरु हमे सही राह दिखाता है। हमारे हर सुख दुख में हमे उचित अनुचित का अनुभव करता है। और जीवन अपर्यंत उसकी शिक्षा का हम लाभ उठाते हुए जीवन का सही उद्येश्य की पूर्ति करते है।

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गुरु ही प्रथम-

गुरु को हमेशा ही प्रथम पूज्य माना गया है। स्वयं कबीर दास जी ने भी कहा है। गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागौ पाय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय॥ यानि गुरु को देवता से ही उच्च स्थान दिया गया है। तभी तो कबीर दस जी ने गुरु रामनन्दाचार्य से गुरु मंत्र लेने हेतु उनके पैरो के नीचे लेट गए। इस लेख की सर्वप्रथम पंक्ति में भी यही बताने का प्रयास किया गया है। कि गुरु बिना हमे न ज्ञान मिलता है और न ही मोक्ष। और हम इस संसार मे जीवन मरण के चक्र में फंसे रहते है। अतः गुरु के बगैर हम किसी भी सही राह का चयन नहीं कर सकते। और गुरु की यही उपयोगिता उसे प्रथम स्थान प्रदान करती है।

गुरु शिष्य परंपरा-

गुरु और शिष्य दोनों का मेल बहुत ही अद्भुत है। ये उसी प्रकार से है जैसे एक जंगल में बिना उद्येश्य के विचरण करने वाला अश्व हो और गुरु के रूप में एक सारथी उसे ज्ञान रूपी लगाम के द्वारा लक्ष्य युक्त बना दे जिससे उसका एक उद्दयेशय तय हो। कई प्राचीन पुरानो और धार्मिक पुस्तकों में गुरु शिष्य की परंपरा की व्याख्या की गई है। एक बालक जब शिष्य बनने अपने गुरु के पास जाता है तो उसमे सादे पृष्ठ की तरह कुछ भी समझ नहीं होता है लेकिन वही गुरु अपने ज्ञान के भंडार से उस शीशी को इतना निपुण बनाता है भविष्य में वो उसी ज्ञान के आधार पर अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करता है।
कुछ प्रमुख गुरु शिष्य परंपरा की बात करे तो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार राम, महर्षि वशिष्ठ से गुरु रूप मे ज्ञान प्राप्त किया था। और श्री कृष्ण ने महर्षि संदीपनी से 16 कलाओं का ज्ञान प्राप्त किया था। तो हम कह सकते है ये गुरु शिष्य परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। स्वयं महाबली हनुमान देवर्षि नारद और सूर्यदेव से शिक्षा प्राप्त की थी और उन्हे अपना गुरु मानते थे। अतः कह सकते है ये गुरु शिष्य परंपरा कितना आवश्यक और अनुपम है।

आधुनिक काल मे गुरु की महत्ता-

बात करे वर्तमान समय की तो आज के समय मे गुरु के अर्थ की तो गुरु का अर्थ केवल शैक्षणिक गतिविधि पूरा कराने वाले वैतनिक व्यक्ति के रूप में सीमित हो कर रह गई है। गुरु के अर्थ की दिव्यता अब उस प्रकार से नहीं है जिसे हम पौराणिक ग्रंथो और कथाओं मे सुनते आए है। अब गुरु केवल हमारे पाठ्य सामाग्री की विषय सूची के अनुरूप हमे पढ़ाता और लिखता है एवं अपना मासिक वेतन लेता है। यहा न तो आज गुरु शिष्य परंपरा देखने को मिलती है और न कि प्राचीन समय जैसी गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति। गुरु शिष्य परंपरा अब केवल व्यापार मात्र बन चुका है। जिसका कार्य वैतनिक श्रम के रूप में सीमित हो चुका है। और कुछ भी नहीं।

कैसे करे गुरु पूजन-

गुरु पुर्णिमा के दिन हम अपने आध्यात्मिक गुरु का पूजन करते है। उनके प्रति हम अपनी श्रद्धा अर्पण करते है। और अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार हम उनका पूजन करते है। लोग गुरु पुर्णिमा के दिन अपने गुरु स्थान जाकर उनके चरण स्पर्श करते है उनको आरती, पुष्प, माला, भोग अर्पण करते है। और उन्हे धन्यवाद देते हुए उनसे आशीर्वाद लेते है कि उनकी ज्ञान रूपी छत्र छाया सदैव हम पर बनी रहे जो हमे जीवन के हर मार्ग पर सही मार्गदर्शन करे।
अब बात आती है जिंहोने आध्यात्मिक गुरुमंत्र न लिया हो उनका क्या तो चूंकि गुरु पुर्णिमा के दिन महान ज्ञानी वेद व्यास का जन्म हुआ था और वो सभी ग्रंथो इत्यादि के ज्ञाता है और उन्होने स्वयं चार वेदों के रचयिता थे तो हम उनका पूजन कर सकते है। या फिर भगवान राम एवं कृष्ण के गुरु महर्षि वशिष्ठ या संदीपनी का पूजन कर सकते है। और सबसे महत्वपूर्ण यज्ञोपवीत संस्कार के समय हमारे प्रथम गुरु के रूप में हम महादेव शिव को अपना गुरु मानते है तो उन्हे भी गुरु के रूप में गुरु पुर्णिमा के दिन पूजन कर सकते है।

निष्कर्ष-

हमारा बुद्धि, विवेक, ज्ञान, कौशल इत्यादि हमे अन्य जीवों से भिन्न बनती है। आध्यात्म और परमात्मा का ज्ञान हमे गुरु से ही प्राप्त होता है। जो हमे जीवन का लक्ष्य तय करना भी सीखते है। इसी लिए गुरु का महत्व हम सभी के जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण है। गुरु की उपयोगिता क्या है ये हम कबीर और एकलव्य से से जान सकते है जिंहोने गुरु की प्राप्ति हेतु कितने जतन किए। अतः गुरु की महत्ता को हम शब्दों मे बांध कर नहीं रख सकते गुरु हमे ज्ञान के प्रकाश से प्रफुल्लित करता है। हमे एक नन्हें पौध से विशाल वृक्ष बनाता है। तभी तो कहा गया है।

गुरूर ब्रह्मा गुरूर विष्णु,गुरु देवो महेश्वरा।
गुरु साक्षात परब्रह्म,तस्मै श्री गुरुवे नमः॥

||इति शुभम्य||

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