हिग्स बोसान (गॉड पार्टिकल): आध्यात्मिक और दार्शनिक विवेचना

हिग्स बोसान (गॉड पार्टिकल): आध्यात्मिक और दार्शनिक विवेचना- स्विट्ज़रलैंड की CERN नामक संस्था ने 2012-2013 में परम तत्व अथवा हिग्स बोसान (गॉड पार्टिकल) को खोजने की घोषणा की। वैसे तो गॉड पार्टिकल की अवधारणात्मक व्याख्या 1960-70 के दशक में ही कर दी गई थी परंतु इसका प्रयोगात्मक विवेचना एवं सत्यता की पुष्टि 2012-13 में CERN के लैब मे हुई। इस लेख का उद्द्येश्य ये है की जिस गॉड पार्टिकल की जानकारी हमे आज हो रही है। उसकी अवधारणा आज से शताब्दियों पूर्व हमारे भारतीय एवं पाश्चात्य दार्शनिको ने परम तत्व एवं परम सत्ता के रूप में कर रखी है। अगर हम ध्यान से देखेंगे तो आज के गॉड पार्टिकल की अवधारणा पूर्व में हमारे दार्शनिक के द्वारा प्रतिपादित किए जा चुके है। तथा उन्होने पहले ही यह सिद्ध किया है कि समस्त जगत का निर्माण और संचालन इस परम सत्ता से ही संभव हुआ है।

भारतीय दर्शन की अवधारणा- प्राचीन भारतीय दर्शन को मूलतः दो शाखाओं में विभाजित किया गया है। आस्तिक दर्शन एवं नास्तिक दर्शन। आस्तिक दर्शन से तात्पर्य जो वेदों विश्वसनीयता मानते है। तथा नास्तिक दर्शक जो वेदों कि विश्वसनीयता नहीं मानते। लेकिन जब बात परम तत्व की आती है तो भारतीय दर्शन की दोनों ही शाखाएँ इस बात को लेकर एक मत है कि इस ब्रह्मांड के निर्माण संचालन और विस्तार में किसी परम तत्व का ही योगदान है। हाँ इन दोनों शाखाओं में बस इस बात का मतभेद है कि उस परम तत्व को इन्होने अलग अलग नाम से परिभाषित किया है।

उदाहरण के रूप में बात सांख्य दर्शन हो तो इन्होने परम तत्व को व्यावहारिक रूप में प्रकृति और पुरुष के नाम से संबोधित किया है। भले ही ये दो नाम हो लेकिन इन एक दूसरे का एकल रूप में कोई अस्तित्व नहीं माना जाएगा ये एक दूसरे के पूरक के रूप में देखे जाते है। इंका कार्य निर्माण और संचालन है। और यही उस परम तत्व के व्यावहारिक रूप की व्याख्या करते है। द्वितीय उदाहरण आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदान्त से है। जिसके अनुसार निर्गुण ब्रह्म को ही परम तत्व एवं परम सत्ता के रूप में परिभाषित किया है।

इनके अनुसार जगत ब्रह्म और माया के द्वारा संचालित होती जिसमें माया को हम वास्तविक मान लेते है। इस जगत केवल ब्रह्म ही वास्तविक और पूर्ण सत्या है। बाकी जो कुछ भी जगत में घटित होता है वो माया के कारण है। तथा वो मिथ्या रूप है। अतः कह सकते है कि निर्गुण ही परम सत्ता एवं तत्व है।

अन्य भारतीय दर्शन की शाखाओं ने भी किसी न किसी रूप में परम तत्व की सत्ता को माना है आस्तिक दर्शन ने भी इसे ब्रह्म के रूप में न मानकर भौतिक तत्व अथवा विचारों के रूप में स्वीकार किया है। किसी ने इसे आत्मा और परमात्मा के रूप में परिभाषित किया है। जिसमे आत्मा भी उसी परमात्मा का अंश माना गया है। लेकिन सभी भारतीय दार्शनिक शाखाओं ने इस जगत के निर्माण और संचालन की व्याख्या हेतु परम तत्व, परम सत्ता कि अवधारणा अवश्य दी है।

पाश्चात्य दर्शन की अवधारणा- पाश्चात्य दर्शन अथवा दार्शनिको की समस्त अवधारणाएं केवल दो पहलुओं पर विकसित हुई है। एक तो तत्व मीमांसा और दूसरा ज्ञान मीमांसा। जिसमे तत्व मीमांसा के द्वारा परम सत्ता एवं परम तत्व की अवधारणा दी गई है। भारतीय दर्शन की तरह ही पाश्चात्य दर्शन में परम तत्व को विचारो, ईश्वर परम सत्ता के रूप में व्याख्यायित किया है। लेकिन आधुनिक गॉड पार्टिकल की अवधारणा का सटीक व्याख्या पाश्चात्य दार्शनिक लाइब्निट्ज़ के चिदणुवाद के सिद्धान्त में देखने को मिलती है।

लाइब्निट्ज़ का चिदणुवाद- जर्मन दार्शनिक लिबनिट्ज़ ने परम तत्व को अपने चिदणुवाद के सिद्धान्त के द्वारा व्याख्यायित किया है। उनके अनुसार जगत का निर्माण जिस तत्व के द्वारा हुआ है। जो सभी तत्वो का मूल है है। जिसे इन्होने चिदणु के नाम से परिभाषित किया। लाइब्निट्ज़ के अनुसार चिदणु ऐसा तत्व है जिस पर किसी बाह्य वस्तु का प्रभाव नहीं है बल्कि समस्त बाह्य वस्तुओं का निर्माण इस चिदणुके द्वारा ही हुआ है। साथ ही साथ इन्होने परम चिदणु की भी व्याख्या की है जिसके कारण सभी सजीव एवं निर्जीव तत्व में चेतना व्याप्त होती है उनमे बस मात्रा का भेद होता है जिससे उसकी प्रकृति सजीव और निर्जीव रूप में भिन्नता लिए होता है। आधुनिक गॉड पार्टिकल की व्याख्या में इसे उस तत्व के रूप में देखा जाता है जो समस्त वस्तुओं में द्रव्यमान अथवा मात्रा प्रदान करती है। इस प्रकार से हम कह सकते है कि लाइब्निट्ज़ के द्वारा दी गई चिदणुवाद का सिद्धान्त आज के हिग्स बोसान के सिद्धान्त से मेल खाती है।

निष्कर्ष

उपरोक्त लेख के द्वारा ये सिद्ध करने का प्रयास नहीं किया जा रहा की आज की वैज्ञानिक विचारधारा एवं प्रयोग का हम खंडन कर रहे है। बल्कि हमारा उद्द्येश्य ये बताना है कि हमारी प्राचीनतम दार्शनिक और आध्यात्मिक विचारधारा कही न कही वैज्ञानिक आधारो पर निर्मित हुई है। तथा जिस परम सत्ता को हम ईश्वर या परमात्मा के रूप में प्राचीन काल से मानते आए है। उसे आज हमारे वैज्ञानिको ने परम तत्व के रूप परिभासित किया है। जिस प्रकार प्राचीन दार्शनिको ने एक तत्व के द्वारा ही समस्त जगत का निर्माण और संचालन माना है। उसी प्रकार आज के वैज्ञानिको ने भी हिग्स बोसान के जरिये समस्त ब्रह्मांड के निर्माण की बात मानी है। अतः हम कह सकते है कि आज के गॉड पार्टिकल की अवधारणा प्राचीनतम परम दार्शनिक परम तत्व की अवधारणा से मेल खाती है।

!इति शुभम्!

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