जब जटायु ने बचाए राजा दशरथ के प्राण और राम के पिता समान होने का पाया उपहार

रामायण और महाभारत मे ऐसे बहुत सारे प्रसंग है जो हमारे लिए बहुत ही प्रेरणादायी और शिक्षाप्रद है लेकिन कुछ प्रसंग ऐसे भी है जो किसी मानक पुस्तक मे न होकर के हमारे घर के बड़ों और बुजुर्गों से सुनने को मिलता है। और क्रमानुसार आगे की पीढ़िओं मे बढ़ता रहता है।

इसी क्रम मे एक कथा आज भी मुझे याद है जो मुझे अपने पिता जी के द्वारा सुनने को मिली थी जिसके अनुसार किस प्रकार जटायु और राम के पिता पुत्र जैसे संबंध के बारे मे बताया गया है और ये सम्मान जटायु को राजा दशरथ के प्राण बचाने के लिए मिला था। तो आइये विस्तार से जानते है इस प्रसंग को।

बात तब की है जब राजा दशरथ की कोई भी संतान नहीं थी। और इस बात को लेकर वो और उनका साम्राज्य बहुत ही चिंतित था। उनकी इस चिंता के समाधान के लिए राजा दशरथ के कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ ने उनके द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ का आयोजन कराया और यज्ञ सम्पन्न होने पर उन्हे अग्नि देव द्वारा दिव्य पेय प्राप्त हुआ जिसको ग्रहण करने के उपरांत उनकी तीनों रानियाँ गर्भवती हुई।

इसी कालक्रम मे रावण के पापों के बोझ से पृथ्वी माता विचलित हो गई और अपने उद्धार हेतु वो भगवान विष्णु के पास पहुंची, उनके उद्धार हेतु भगवान विष्णु ने अवतार लेने का निर्णय लिया और ये बात समस्त लोक मे फैल गई। तत्पश्चात देवताओं ने ये बात आकाशवाणी के जरिये राजा दशरथ और उनकी रनियों को भी बताई।

इतना शुभ समाचार सुनकर राजा दशरथ फुले नहीं समा रहे थे और ये समाचार सबको सुनाने के लिए व्याकुल हो गए। अंततः उन्होने सभी को ये समाचार सुनाने का निर्णय लिए और एक एक कर सभी लोको मे जाकर वहाँ के वासियों को इसकी सूचना दी।

भगवान विष्णु के अपने गृह मे जन्म की खबर सुनाने के लिए राजा दशरथ शनि देव के पास भी पहुंचे। उनके महल मे पहुँच कर देखा कि शनि देव उल्टी तरफ मुंह करके खड़े है। इसपर राजा दशरथ ने उन्हे अपनी तरफ मुख करने को कहा जिस पर शनि देव ने बोला मेरी दृष्टि सभी के लिए कष्टकारी है अतः जो कुछ भी कहना आप ऐसे ही कहो। मुझे आपकी तरफ मुख करने को विवश न करें।

इस पर राजा दशरथ ने कहा अब तो स्वयं प्रभु मेरे घर जन्म लेने वाले है फिर मेरा अहित कैसे हो सकता है। आप मुझे अपने मुखारविंद के दर्शन अवश्य कराये। बहुत कहने पर भी राजा दशरथ, शनि देव के मुख दर्शन की बात पर अड़े रहे और अंततः शनि देव को अपनी दृष्टि राजा दशरथ की तरफ करनी ही पढ़ी।

जैसे ही शनि देव ने अपना मुख राजा दशरथ की तरफ किया वो सीधा शनि लोक से पृथ्वी लोक की ओर गिरने लगे और उनके प्राण संकट मे पड़ गए वहीं दूसरी तरफ गिद्धराज जटायु ऊंचे आसमान मे विचरण कर रहे थे और उन्होने किसी मनुष्य को आसमान से गिरते हुए देखा। और गिद्धराज जटायु आसमान मे उस ओर बढ़ चले।

अंततः गिद्धराज जटायु ने राजा दशरथ को अपने पंखों मे भर लिया और सकुशल उनको धरती पर लेकर आए और उनके प्राणों की रक्षा की।

गिद्धराज जटायु की इस तत्परता और प्राण रक्षा की कला से राजा दशरथ बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होने जटायु को हर्ष के साथ बोला जिस प्रकार से आप ने मेरे प्राणों की रक्षा की है। और मेरा जीवन बचा कर मुझे मेरे होने वाले बच्चे का मुख देखने का सौभाग्य दिया है। मै आपको ये सम्मान देता हूँ कि मेरी प्रथम संतान आपको पिता का दर्जा देगी।

इस प्रकार से राजा दशरथ ने गिद्धराज जटायु को राम के पिता समान होने का सम्मान प्रदान किया। और आगे के प्रसंग मे ये देखने को भी मिलता है किस प्रकार से रावण से युद्ध करते हुए और सीता के अपहरण को रोकते हुए गिद्धरज जटायु धराशायी हुए और राम ने उनकी मृत्यु के उपरांत एक पुत्र के जैसा उनका अंतिम संस्कार किया।

उपरोक्त प्रसंग को ध्यान से देखा जाये तो ये किसी भी रूप मे ऐसा नहीं प्रतीत होगा कि ये एक रूपांतरित कहानी है। बल्कि सीता हरण के प्रसंग मे किस प्रकार रावण से लड़ते हुए गिद्धराज जटायु ने अपने प्राणो की आहुति दे दी और राम ने उनको पिता जैसा अंतिम सम्मान दिया। भले ही किसी मानक पुस्तक मे इस प्रसंग को नहीं देखा जा सकता है परंतु जिस प्रकार से ये प्रसंग अपनी तार तम्यता मूल कथा से जोड़ता है वो इसकी प्रामाणिकता सिद्ध करता है।

आने वाले लेखों मे हम ऐसी अन्य रामायण, महाभारत एवं अन्य पौराणिक कहानियाँ और प्रसंग बताते रहेंगे जो हमारी संस्कृति, धर्म और सभ्यता का एक झलक प्रस्तुत करती है।

||इति शुभम्य||

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