गौ पूजन का महत्व- जाने क्यों होती है गाय की पूजा

सनातन धर्म मे गौ पूजन का बहुत महत्व है। गाय की सेवा उसका पूजन हमारे समाज में बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। गोपाष्टमी को तो गौ पूजन का विशेष प्रचालन है। प्राचीन समय में हर घर में गौ पालन का कार्य अवश्य होता था। घर के बनने वाले बोजान मे पहली रोटी गाव को ही प्रदान की जाती थी। माना जाता था कि इससे घर मे समृद्धि बनी रहती थी। हमारे पूर्वज के द्वारा बताया जाता है और आध्यात्मिक ग्रंथो मे भी वर्णन है कि गाय में 33 करोड़ देवी देवताओं का वास है। इसीलिए गाय एक पूजनीय पालती जानवर के रूप में मान्यता पायी जाती है।
अब प्रश्न ये उठता है कि कैसे गाय मे 33 करोड़ देवी देवताओं का वाश होता इसके पीछे की कथा क्या है। क्यों गाय इतनी पूजनीय होती है। तो हम इसे विस्तार से जानने का प्रयास करेंगे।

33 करोड़ देवी देवताओं का वाश-

वैसे तो 33 करोड़ देवी देवताओं का गाय मे वाश होने के बहुत सारे कथा किंवदंती प्रचलित है। लेकिन सबसे प्रमुख कथा इस प्रकार से है। जिसका वर्णन प्रमुख प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। तथा इस घटना से कई छोटे छोटे अन्य तथ्य भी और घटनाए जुड़ी हुई है।

देवासुर युद्ध में देवताओं का पराजय-

एक समय की बात है देवताओं और असुरों का संग्राम हो रहा था। तथा असुरों के गुरु शुक्राचार्य के नीतियो के कारण असुर युद्ध में परास्त नहीं हो रहे थे और जो भी असुर युद्ध में मारे जाते उन्हे शुक्राचार्य संजीवनी मंत्र का प्रयोग करके जीवित कर देते थे।
जिसके कारण देवता गण चिंतित हो गए उन्हे कोई भी उपाय नहीं मिल रहा था और उपाय ढूंढते ढूंढते वो देवगुरु वृहस्पति के साथ त्रिदेव के पास पहुंचे। और उपाय के रूप में उन्हे बोला गया यदि किसी तपस्वी ऋषि के अस्थियों से एक अस्त्र का निर्माण किया जाये और देवराज इंद्र उसे धरण करे तो देवता असुरों से युद्ध जीत सकते है।

देवताओं का महर्षि दधीचि से अनुरोध-

उस अस्त्र की चाह मे सभी देवता देवगुरु वृहस्पति के साथ महर्षि दधीचि के पास पहुंचे और उनसे समस्त व्याख्यान कहा और उनसे अनुरोध किया कि उनके जैसे तपस्वी मुनि की अस्थियाँ यदि उन्हे मिल जाये और उससे अस्त्र का निर्माण किया जाये तो असुर का युद्ध मे हार होगा तथा समस्त संसार में सत्य, नीति, सद्भाव इत्यादि का विस्तार होगा अन्यथा असुर के विजय उपरांत पाप, कुरीति एवं अन्य विकारो का विस्तार संसार मे हो जाएगा। और संसार का संचालन बिगढ़ जाएगा।

महर्षि दधीचि का त्याग-

चूंकि महर्षि दधीचि एक तपस्वी मुनि थे और जन कल्याण उनके लिए सर्वोपरि था। इसलिए उन्होने इस त्याग को स्वीकार किया और अपने प्राणो की आहुति देने के लिए सहर्ष तैयार हो गए। इस पर देवताओं ने प्रसन्न होकर उन्हे कोई भी वरदान मानने को कहा और उनकी कोई भी एक इच्छा पूरी करने को बोला चुनी महर्षि के लिए जनकल्याण बहुत ही महत्वपूर्ण था तो उन्होने वर भी ऐसा मांगा कि जिससे जन कल्याण जुड़ा था जिससे सभी जन को लाभ हो।

नैमिषारण्य मे सभी तीर्थों का वाश-

चूंकि महर्षि दधीचि का आश्रम नैमिषारण्य में स्थित था और वो अपने शरीर त्याग से पहले सभी तीर्थों का दर्शन करना चाहते थे इसलिए उन्होने देवताओं से सभी तीर्थों का नैमिषारण्य में वाश करने हेतु वर मांगा और इंका वाश सदैव के लिए इस पवन स्थान में रहे जिससे आने वाले समय में भी जन मानस को इसका लाभ मिलता रहे जो भी व्यक्ति सभी तीर्थों के दर्शन मे असमर्थ हो वो केवल नैमिषारण्य आकर सभी तीर्थों के दर्शन का लाभ उठा सके। और देवताओं ने उन्हे ये वरदान दे दिया। आज भी उत्तर प्रदेश राज्य के सीतापुर जिले में पवित्र नैमिषारण्य तीर्थ स्थित है। और वह सभी तीर्थों के दर्शन का समान लाभ लिया जा सकता है।

गाय की अपवित्रता और 33 करोड़ देवी देवताओं का वाश-

जब महर्षि दढेच ने अपनी अस्थियाँ देने हेतु अपने शरीरी का त्याग किया तो समस्या उनके शरीर से अस्थियाँ प्राप्त करने की हुई जैस्पर सभी ने निर्णय लिया महर्षि के शरीर पर नमक का लेप लगाकर स्वर्ग की गाय कामधेनु से शरीर को जीभ से चाटने को बोला जाये तो अस्थियाँ प्राप्त हो जाएंगी। इस पर कामधेनु को भाय हुआ कि यदि उसने ऐसा कृत्य किया तो वह अपवित्र भी हो जाएगी साथ ही साथ उसे पाप का भी भागीदार होना पड़ेगा।

इस पर देवताओं ने कामधेनु को आश्वस्त किया कि अस्थियाँ मिलने के बाद सभी देवी देवता उनके शरीर के समस्त अंगो पर वाश करेंगे जिससे वो पाप मुक्त हो जाएगी और वो पूजनीय भी हो जाएगी उसके पूजन मात्र से सभी देवी देवताओं के पूजन का फल मिलेगा जन मानस को। इस पर कामधेनु ने अपना कर्तव्य निभाया और गौ का समस्त अंग पूजनीय हो गया लेकिन कामधेनु के मुख और नथुने इतने अपवित्र हो गए कि किसी भी देवी देवता का वहाँ वाश करने का सामर्थी नहीं हुआ और इसीलिए आज भी गाय के नथुने और मुख को अपवित्र माना जाता है और उसे हाथो से ही भोग दिया जाता है।
इस प्रकार से गौ हमारे समाज मे पूजनीय मानी जाती है और उसके शरीर पर देवी देवताओं का वाश माना जाता है।

निष्कर्ष-

गौ पूजन हर सनातन धर्म के अनुयाई के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। स्मजिक या लौकिक रूप से भी देखा जाये तो गाय हमारे समाज के लिए बहुत उपयोगी है। गाय के दूध का हम सेवन करते है। पहले के समाज में मिट्टी के घरो मे गाय के गोबर से लेपन करते थे जिससे मच्छर मक्खियाँ हमारे घरों से दूर रहती थी। चूल्हे मे जलाने के लिए उपले भी गाय के गोबर का प्रयोग किया जाता था। गाय से होने वाले बछड़े का प्रयोग उसके बड़े होने पर हम बैलगाड़ियों मे समान ढोने और खेतों को जोतने के काम मे करते थे।
अतः चाहे आध्यात्मिक रूप से कहे या फिर सामाजिक रूप से गाय हा महत्व हमारे दैनिक जीवन मे बहुत ही अधिक है। आध्यात्मिक रूप से भी गाय को पूजनीय सिद्ध किया जा चुका है। और इसीलिए आज भी गाय के पूजन और सेवा के द्वारा समस्त देवी देवताओं के पूजन और सेवा का लाभ उठा सकते है।

||इति शुभम्य||

 

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