पिता पुत्र (Father and Son) का उत्तराधिकार स्थानांतरण और कर्तव्य- प्राचीन परंपरा

Father and Son

आज के वर्तमान समय मे हम पिता और पुत्र (Father and Son) के मध्य होने वाले उत्तराधिकार के स्थानांतरण को बहुत ही सीमित रूप मे देखते है। आज के समय के अनुसार पिता की संपत्ति और संसाधनो पर एक समय के उपरांत पुत्र का अधिकार हो जाने को ही उत्तराधिकार स्थानांतरण के रूप मे देखते है।

साथ ही साथ हम इसके स्वरूप को बहुत ही संकुचित रूप प्रदान कर चुके है। पुत्र का पिता के प्रति कर्तव्य और उसके गुण स्वरूप के भी स्थानांतरण की हम बात भी नहीं करते है। तो आज हम इस लेख के जरिये इसकी व्याख्या करेंगे। जिससे जुड़ी एक प्राचीन प्रसंग इस प्रकार से है।

महात्मा शिबी और उनका पुत्र सत्यवान-

महात्मा शिबि सर्व वेदों के ज्ञाता पुरुष थे। इनमे परोपकार की भावना, दयालुता इत्यादि समस्त गुण अच्छे से विद्यमान थे। इनके पुत्र का नाम सत्यवान था जो कि अपने पिता शिबि की ही तरह ज्ञानी, दयालु, परोपकारी था।

दोनों पिता पुत्र के मध्य बहुत ही अधिक प्रेम था। पुत्र अपने पिता की सेवा सच्चे मन से करता था। जबकि पिता, पुत्र के सामाजिक, आध्यात्मिक और बौद्धिक विकास के लिए अपने कर्तव्यों का बहुत ही अचके से पालन करते थे।

समय बीतने के साथ ही महात्मा शिबि की अवस्था हो चली और उन्होने अपना गृह त्याग अपने उत्तराधिकार को स्थानांतरण अपने पुत्र को करने का मन बनाकर सन्यास आश्रम ग्रहण करने का विचार किया। इसके लिए वो अपने पुत्र सत्यवान के गुरु पिप्पलाद के पास गए और उन्हे अपनी मनसा बताई।

और गुरु से आग्रह किया कि वो उनके पुत्र को इस इसके लिए निर्देश दे। उनके कहने पर सत्यवान उनकी बातों को कभी भी टालेगा नहीं। महर्षि पिप्पलाद ने इस विचार पर हर्ष व्यक्त किया और सत्यवान को निर्देशित करने के लिए तैयार हो गए।

महर्षि पिप्पलाद ने समस्त बाते सत्यवान के सम्मुख रखीं। जिसपर सत्यवान उसे टाल नहीं सकता था और समस्त क्रियाएँ वैदिक रीति रिवाज से निभाने के लिए तैयार हुआ। तथा एक शुभ तिथि का निर्धारण इसके लिए तय किया गया।

गुण और विचारों का स्थानांतरण-

निश्चित शुभ तिथि आने के दिन सारे संप्रदान कर्म कि तैयारी होने लगी। दोनों पिता और पुत्र यज्ञवेदी के सम्मुख बैठे और मंत्र उच्चारण शुरू हुआ दोनों ने संप्रदान कर्म हेतु संकल्प लेना शुरू हुआ।

इस संप्रदान कर्म का तात्पर्य बिलकुल भी नहीं था कि इसके जरिये पिता की संपत्ति इत्यादि का स्थानातरण पुत्र को किया जाएगा। वो तो स्वतः ही पिता के मृत्यु के उपरांत पुत्र को मिल जाएगा। बल्कि इस संस्कार मे गुणो और विचारो इत्यादि का स्थानांतरण हुआ।

पुत्र को पिता का प्रतिबिंब माना जाता है। और संप्रदान कर्म का उद्देश्य भी यही होता है कि पुत्र पिता के कर्म शैली, उसके गुण उसके विचारो को ग्रहण करे और उस व्यक्ति की स्थापित कड़ी को आगे इस संसार मे आगे बढ़ाए।

इस प्रकार से संप्रदान कर्म के जरिये पिता जब सांसरिक ज़िम्मेदारी से मुक्त हो तो भी उसका प्रतिबिंब स्वरूप उसके पुत्र मे विध्यमान हो जो कि उसकी गुण रेखा का प्रचार प्रसार करे।

अतः महात्मा शिबि ने अग्नि को साक्षी मानकर वैदिक मंत्रो के समक्ष अपनी विमलता, अपना कर्मशैली, अपना बुद्धि विवेक इत्यादि का स्थानांतरण सत्यवान को किया। और सत्यवान ने भी साक्षी मानते हुए इन्हे विनम्रता पूर्वक ग्रहण किया।

पिता के प्रति पुत्र का कर्तव्य- 

संप्रदान संस्कार सम्पन्न होने के उपरांत पिता को सब कुछ त्याग कर साधना हेतु वन गमन करना होता है। लेकिन जब महात्मा शिबि वन गमन हेतु तैयार हुए तो उनके पुत्र सत्यवान ने अपने गुरु महर्षि पिप्पलाद के सामने एक अनुरोध किया कि यदि संभव हो तो मेरे पिता वन गमन न करके हमारे साथ रहे और यहीं साधना करे।

और अपना सन्यास जीवन का अनुसरण करें। इसपर महर्षि पिप्पलाद ने महात्मा शिबि को बोला यदि घर मे ही बिना कोई अडचन के साधना की जा सकती है तो वन गमन की कोई आवश्यकता नहीं।

और यदि तुम्हारा पुत्र तुमहरि सेवा करना चाहता है तो पुत्र द्वारा की गई सेवा से सन्यास आश्रम मे बिघन नहीं माना जाता है क्योंकि ये तो एक पुत्र अपने माता पिता के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता है।

इस आग्रह पर और महर्षि पिप्पलद के द्वारा इसे उचित मानते हुए महात्मा शिबि अपने पुत्र के साथ रहने को तैयार हो जाते है तथा उनके पुत्र सत्यवान को भी अपने पिता की सेवा करने का जो अवसर मिलता है उससे उन्हे भी बहुत खुशी मिलती है।

निष्कर्ष

हमने पिता पुत्र के कर्तव्यों, उनके मध्य प्रेम, और विश्वास को इस लेख के द्वारा बताने का प्रयास किया है। उत्तराधिकार की सही व्याख्या इस प्रसंग से जानने को मिलती है। जिसके अनुसार उत्तराधिकार का सही अर्थ होता है पिता के द्वारा उसके गुणो, विचारो, कर्मशैली इत्यादि का स्थानांतरण न कि संपत्ति वैभव का स्थानांतरण।

आज के समय मे भले ही हमने इसकी व्याख्या को केवल भौतिक संसाधनो इत्यादि से जोड़ रखा है। लेकिन सही मैने मे पिता के प्रतिबिंब को समाज मे प्रदर्शित करना और उसके गुण विचारो को प्रकट करते रहना ही असली उत्तराधिकारों का स्थानांतरण है।

संपत्ति तो समाप्त हो सकती है तथा संपत्ति के जरिये आप अपने कुल की विशेषता नहीं प्रदर्शित कर सकते है जबकि गुणो, विचारो के जरिये ही आपके कुल इत्यादि का परिचय देना ही सही होगा। और यही सही मैने मे उत्तराधिकार का स्थानातरण है तथा ये कालक्रम मे हर एक पिता से अपने पुत्र को अवश्य ग्रहण करना चाहिए।

आज के समय मे हम पिता की संपत्ति के लिए संगर्ष करते है। लेकिन एक पुत्र को इस मूल्यवान संपत्ति के लिए संगर्ष करना चाहिए।

दूसरी तरफ कर्तव्यों की बात की जाये तो एक पिता का जीवन भर कर्तव्य रहता है कि वो अपने पुत्र पुत्री के जीवन यापन उनके सामाजिक विकास मे सहयोग करे लेकिन सही मायने मे पुत्र का भी कर्तव्य होता है कि वो अपने पिता की सेवा को सर्वोच्च मानते हुए हमेशा इसका पालन करे।

जिस प्रकार से सन्यास आश्रम ग्रहण करने के उपरांत भी सत्यवान ने अपने पिता की सेवा की आग्रह की और उन्हे घर मे रहकर ही साधना करने हेतु अनुरोध किया उसी प्रकार हर पुत्र का कर्तव्य है कि अपने माता पिता की सेवा को सर्वोपरि माने । और असली पुण्य फल की प्राप्ति करे।

||इति शुभम्य||

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