दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कथा

दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कथा- पुरुवंशी प्रतापी राजा दुष्यंत एक बार शिकार पर वन की तरफ गए। मृग का पीछा करते करते राजा दुष्यंत अपने सहयोगियों से बिछड़ गए। और प्यास से विचलित होकर एक आश्रम में पहुंचे। और जल हेतु एक बहुत ही सुंदर स्त्री को अनुरोध किया। ये आश्रम कण्व ऋषि का था और जिस स्त्री से राजा दुष्यंत ने जल हेतु आग्रह किया था उसका नाम शकुंतला था। शकुंतला, अप्सरा मेनका और विश्वामित्र की संतान थी। जिसे मेनका ने कण्व ऋषि के आश्रम में छोड़ कर चली गई थी। कण्व ऋषि ने शकुंतला ने अपने पुत्री के रूप में पालन पोषण किया था। जब राजा दुष्यंत कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंचे थे उस समय कण्व ऋषि किसी कार्य वश आश्रम से बाहर गए हुए थे। राजा दुष्यंत के जल हेतु आग्रह पर शकुंतला ने उन्हे जल प्रदान किया और आश्रम के नियमो के अनुसार उन्हे उचित भोजन और विश्राम करने की व्यवस्था की।

शकुंतला के इस सत्कार और उसके सौन्दर्य से मोहित होकर राजा दुष्यंत ने शकुंतला से विवाह का अनुरोध किया। शकुंतला को भी राजा दुष्यंत का अनुरोध पसंद आया और आश्रम में ही दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ। चूंकि कण्व ऋषि उस समय आश्रम में नहीं थे तो शकुंतला दुष्यंत के साथ उनके गृह नगर नहीं जा सकती थी। जिस कारण दुष्यंत अपने गृह नगर वापस चले जाते है और कण्व ऋषि के आने के उपरांत शकुंतला को उनके नगर आने को बोलते है। और अपनी राज मुद्रिका शकुंतला को प्रदान कर प्रस्थान करते है।

दुष्यंत के जाने के उपरांत शकुंतला हर क्षण दुष्यंत की कल्पना में कोई रहती है। उसे किसी बात की परवाह नहीं रहती बल्कि वो दुष्यंत के प्रेम में अपना सुध बुध खोकर अपनी कल्पना लोक में खोयी रहती है। इसी बीच दुर्वाषा ऋषि का आगमन आश्रम में होता है। और वो शकुंतला को जल प्रदान करने हेतु बोलते है। लेकिन दुष्यंत के कल्पना में होने के कारण वो दुर्वाषा ऋषि की बातों का ध्यान नहीं देती जिसे देखकर दूर्वाषा ऋषि क्रुद्ध हो जाते है और शकुंतला को श्राप देते है है कि जिसके ख्यालों में वो खोई है वो उसे भूल जाएगा। इसके पश्चात शकुंतला को अपनी गलती का एहसास होता है और वो दूर्वाषा ऋषि से पनि गलती हेतु क्षमा मांगती है। जैस्पर दूर्वाषा ऋषि शांत होकर बोलते है। वो अपना श्राप तो वापस नहीं ले सकते लेकिन जब वो दुष्यंत की दी हुई मुद्रिका उसे दिखाएगी तो उसे पुनः सब कुछ याद आ जाएगा।

कुछ दिनो उपरांत कण्व  ऋषि जब आश्रम में वापस आते है तो उन्हे सारी बातों का पता चलता है। तथा शकुंतला के गर्भवती होने का भी समाचार प्राप्त होता है। इस पर कण्व ऋषि अपने शिष्य के साथ शकुंतला को दुष्यंत के गृह नगर भेजते है। रास्ते में शकुंतला एक सरोवर में जल करने जाती है। और दुष्यंत की दी हुई मुद्रिका जल में प्रवाहित हो जाती है। और जिसे एक मछली ग्रहण कर लेती है।

इसके उपरांत जब शकुंतला दुष्यंत के दरबार में पहुँचती है तो दुष्यंत श्राप के कारण उसे पहचानने से इंकार कर देता है। और शकुंतला को दरबार से बाहर कर दिया जाता है। इसके उपरांत शकुंतला दुखी होकर कण्व ऋषि के आश्रम में न जाकर दुष्यंत के राज्य में एक कबिलाई समुदाय के साथ अपना जीवन यापन करने लगती है। और एक तेजस्वी पुत्र को जन्म देती है। जिसका नाम भरत होता है। और इसी बालक के नाम पर हमारे देश का नाम भारत वर्ष पड़ा।

कालक्रम में एक दिन एक मछुवारे को वो मछली मिली जिसने दुष्यंत की दी हुई मुद्रिका ग्रहण कर ली थी। जब मछुवारे को मुद्रिका पर राजा दुष्यंत की राज मुद्रिका प्राप्त हुई तो भय वश वो उसे लेकर राजा दुष्यंत को देने के लिए उनके राज दरबार में आया। राज मुद्रिका पाकर दुष्यंत को सब कुछ पुनः याद आ गया। और दुष्यंत शकुंतला को मिलने के लिए विचलित हो गया। और उनकी तलाश कर शकुंतला और अपने पुत्र भरत के साथ वापस आकार अनादमय जीवन व्यतीत करने लगते है।

शिक्षा

इस कहानी से ये शिक्षा मिलती है कि किसी के प्रति इतना भी मोह नहीं रखना चाहिए जिससे की हम अपने कर्तव्यों और वास्तविक जीवन से विचलित हो जाये। अगर शकुंतला, दुष्यंत के मोह में वास्तविकता से कल्पना लोक में न होती और दूर्वाषा ऋषि के आगमन पर उनका सत्कार करती तो उसे श्राप नहीं मिलता और इतना वियोग भरा जीवन नहीं जीना पड़ता। द्वितीय जिस प्रकार राजा दुष्यंत शकुंतला के प्रेम सद्भाव, सेवा और सत्कार को देखकर अपने पद गरिमा न देखते हुए शकुंतला को अपनी पत्नी बनाने को तैयार हो जाते है। उसी प्रकार हर किसी को अपने पद गरिमा इत्यादि का घमंड न करते हुए अच्छे व्यक्तियों को अपने जीवन में अपना लेना चाहिए। शकुंतला के अज्ञानता वश किए गए दुर्व्यवहार के कारण दूर्वाषा ऋषि उसे श्राप देते है। लेकिन इससे ये शिक्षा मिलती है की अगर कोई आपसे अपनी गलतियों की क्षमा मांगे तो अपने क्रोध को भुलाकर शांत भाव से उसे क्षमा प्रदान करना चाहिए। जिस प्रकार दूर्वाषा ऋषि ने अपने क्रोध को शांत कर शकुंतला को दिये श्राप को खंडित करने का उपाय दिया।

(जब श्राप के समाप्त होने पर दुष्यंत शकुंतला को ढूंढते हुए कबीलाइयों के इलाके में पहुँचते है तो उन्हे एक बालक दिखता है। जिसके मुख पर तेज भरा हुआ रहता है। और वो बालक एक सिंह के ऊपर बैठकर उसके मुखको अपने हाथों को खोलकर उसके दाँतो को गिनने का प्रयास कर रहा होता है। यही बालक दुष्यंत और शकुंतला का पुत्र भरत होता है। और इसी के नाम पर हमारे देश का नाम भारतवर्ष रखा जाता है।)

 

 

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