मन की मलिनता (Discordance of mind) ईश्वर साधना मे बाधक- प्रसंग

प्रतिदिन हम सुबह उठकर स्नान शौच इत्यादि के जरिये अपनी शारीरिक मलिनता को खत्म करते है। लेकिन मन की मलिनता (Discordance of mind) की सफाई करते है इसको लेकर शंशय होना स्वाभाविक है। केवल शारीरिक शुद्धि से हम ईश्वर साधना मे पूर्णता नहीं प्राप्त कर सकते है। बल्कि इसके लिए मानसिक शुद्धि अति आवश्यक तत्व है। रैदास की लिखी पंक्ति मन हो चंगा तो कठौती मे गंगा में मन की शुद्धि की आवश्यकता सिद्ध करती है। ईश्वर साधना हेतु जितनी आवश्यकता शारीरिक शुद्धि की होती उससे कहीं ज्यादा आवश्यक मन की शुद्धि है।

क्यों है मन की शुद्धि आवश्यक- हमारे धर्म शास्त्रों मे पाप और पुण्य का वर्णन किया गया है जिसके अनुसार हमारे जीवन का निर्धारण किया जाता है। और इस पाप एवं पुण्य के तीन भेद बताए गए है। जिन्हे मनसा, वाचा और कर्मणा के रूप मे जाना जाता है। मन से, वचन से या कर्म से तीनों रूपों मे किया गया पाप अथवा पुण्य को समान रूप से स्थान दिया जाता है। अतः मन से किया गया पुण्य अथवा पाप भी उसी समान है जैसे कर्म से किया गया पाप अथवा पुण्य। तो ये बात तो सिद्ध हो जाती है कि मन की शुद्धि हमारे जीवन मे कितनी आवश्यक है।

इसके साथ ही मन की शुद्धि से हमारे विचार भी बहुत ही निर्मल होते है। जो हमे आत्म संतुष्टि एवं आनंद प्रदान करते है। अगर हमारा मन स्वच्छ होगा तो हमारे मन के विचार भी स्वच्छ होंगे और वे हमारे जीवन के सही आनंद की अनुभूति भी कराएंगे। मन की शुद्धता के कारण जब हमारे विचारों मे शुद्धता रहेगी तो कोई अनुचित कार्य करने से भी हम बचेंगे जो हमे सद्मार्ग की ओर ले जाएँगे।

साधु तथा उनके शिष्य का दूषित मन- इस संबंध मे एक प्रसंग है, प्राचीन काल की बात है एक तपस्वी साधु महाराज अपने शिष्य के साथ जंगल से होते हुए अपने आश्रम की ओर जा रहे थे। जंगल का रास्ता था। उबड़ खाबड़ पगडंडियों पर दोनों लोग चले जा रहे थे। रास्ते मे एक नदी दिखी और उसे पार करके ही आगे का रास्ता तय किया जा सकता था। उसी नदी के तट पर एक स्त्री भी बैठी थी। महिला बहुत ही चिंतित लग रही थी। तपस्वी से रहा नहीं गया उन्होने उस महिला से उसके परेशानी का कारण पूछा।

महिला ने बताया उसे नदी के उस पार जाना है। उसका गाँव उसपार ही है। लेकिन उसे तैरना नहीं आता। नदी बहुत गहरी है। इसपर उस तपस्वी ने कहा तुम्हें परेशान होने की आवश्यकता नहीं अगर तुम उचित समझो तो हम तुम्हें उस पार पहुंचा देंगे। महिला को तो उस पार जाना अति आवश्यक था इसलिए वो तैयार हो गई। तपस्वी साधु ने महिला को अपने कंधे पर बैठाकर उसे उस पार पहुंचा दिया।

ये वाकया देखकर साधु का शिष्य सोच मे पढ़ गया। और पूरे रास्ते इसी विचार मे रहा की कैसे उसके गुरु ने उस महिला को अपने कंधे पर बैठाकर नदी के पार पहुंचाया। उन्होने ये भी नहीं सोचा की वो एक तपस्वी है। और एक सन्यासी को ऐसी चीजें सोभा नहीं देती। शिष्य सोचता रहा। तपस्वी को एहसास हुआ कि उनका शिष्य महिला को उसपार पहुँचने वाली बात को लेकर सोच मे पड़ा हुआ है।

और साधु ने अपने शिष्य को टोकते हुए बोला कि शिष्य किस सोच मे पड़े हो। जिस भी दुविधा मे हो मुझे बताओ मै उसका निदान करने का प्रयास करूंगा। इसपर शिष्य ने बोला क्षमा करे गुरुदेव लेकिन एक महिला को आपने अपने कंधे पर बैठाकर नदी पार कराया क्या एक साधु, तपस्वी के लिए ये उचित है। इसपर उनके गुरु ने मुसकुराते हुए बोला मैंने उस महिला को नदी के एक पार अपने कंधे पर बिठाया और दूसरे क्षोर पर उतार दिया लेकिन तुमने तो उस महिला को लेकर गलत विचार अपने मन मे अभी तक बैठा रखा है, ये अनुचित है। मैंने उसकी सहता की मेरे मन मे केवल उसकी सहायता को विचार आए और कुछ भी नहीं आया अतः इसका मुझे कोई ग्लानि नहीं लेकिन तुम्हारे मन की अशुद्धता जो उस महिला और मुझे लेकर उत्पन्न हुई वो गलत है। शिष्य को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने अपने गुरु से क्षमा मांग ली।

मंदिर के पुजारी और वैश्या की कहानी- प्रसंग इस प्रकार से है कि किसी स्थान पर एक मंदिर रहता है और उसका एक पुजारी रहता है जो कि रोज ईश्वर की आराधना, पूजा करता है। और वही उस मंदिर के सामने एक महिला रहती है। जो कि वैश्या का व्यवसाय करती है। जब उन दोनों की मृत्यु होती है और दोनों यमलोक मे धर्मराज के समक्ष प्रस्तुत होते है। तो धर्मराज पुजारी को नरक वाश का आदेश देते है जबकि उस महिला को स्वर्ग वाश का।

इसपर पुजारी अचंभित होता है और धर्मराज से प्रश्न कर बैठता है आखिर ऐसा कैसे हो सकता है। उसने अपना सर्वस्व जीवन ईश्वर भक्ति और वंदना मे गुजारी। एक दिन भी ऐसा नहीं गया जिस दिन उसने मंदिर मे भगवान की सेवा न की हो और मुझे नरक वाश का आदेश हुआ। वहीं दूसरी तरफ उस महिला ने इतना निम्न कोटि का कर्म किया है। उसने समाज मे निषेधित कर्म किया है और उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है ऐसा अन्याय क्यों हुआ।

इस पर धर्मराज बोले इसके लिए सबसे प्रमुख कारण आपके मन की अशुद्धता उत्तरदायी है। आपके कर्म देखने मे भले भी बहुत अच्छे रहे हो। रोज आपने भले ही भगवान के मंदिर मे निर्बाध रूप से सेवा की हो लेकिन सेवा करते हुए हमेशा तुम्हारे मन मे सामने रहने वाली महिला के कर्मो को लेकर ही विचार आए। भगवद सेवा के समय भी तुम्हारा मनस स्वच्छ नहीं रहा बल्कि तुम केवल महिला के कर्मो को ही घृणित मानते हुए अपने सभी कर्म किए। वहीं दूसरी तरफ उस महिला के कर्म निम्न होते हुए भी हर क्षण उसके मन मे यही विचार रहा कि काश वो भी मंदिर मे प्रवेश करती वो ईश्वर की वंदना, आराधन करती उसे भी दर्शन के लाभ मिलते लेकिन जीवकोपार्जन हेतु किए गए उसके कर्म इस मार्ग मे बाधा बन रहे थे लेकिन उस महिला के मन के विचार बहुत ही सुद्ध और सात्विक थे अतः मन की स्वच्छता के कारण उसे स्वर्ग वाश का अधिकार प्राप्त हुआ।

निष्कर्ष

मनुष्य जीवन भर अपने कर्मो से बंधा रहता है। लेकिन उसके कर्मो का क्रियान्वयन भी उसके विचारों के द्वारा निर्धारित होता है। चाहे कोई भी कर्म हो उसे करने से पहले मानव के मन मे विचार अवश्य आते है। उसके विचार ही उसकी शैली का निर्धारण करते है। हमारे जीवन के निर्वाह का मार्ग भी हमारे विचारो के द्वारा ही निर्देशित होते है। और जब तक हमारे विचार स्वच्छ और निर्मल नहीं होंगे तब तक हमारे कर्म भी सही नहीं माने जाएँगे। सनातन धर्म के अनुसार परम सत्ता का आत्म साक्षात्कार ही हमारा मूल लक्ष्य होना चाहिए। और इसके लिए हमारे विचार और मन की शुद्धता अति आवश्यक है। जब हमारा मन शुद्ध रहेगा तभी हमारी ईश्वर साधना भी पूर्ण मानी जाएगी।

||इति शुभम्य||

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