धर्म परिवर्तन एक कपोल कल्पना- दार्शनिक विवेचना

dharm parivartan- kissa Kahani

समय समय पर हमारे देश और अन्य देशों मे धर्म परिवर्तन संबंधी खबरें सुनने को मिल जाती है। कहीं किसी ने धर्म परिवर्तन कर लिया या फिर कहीं किसी का जबरन अथवा प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करा दिया गया। पर क्या सच मे धर्म परिवर्तन जैसी कोई व्यवस्था मूर्त रूप मे है या फिर ये बस एक कपोल कल्पना है। जिसे हम सही मान लेते है। आज हम इस विषय पर विस्तार से बात करेंगे।

देखा जाये तो आज के समय मे हमने धर्म को गलत ढंग से परिभाषित कर दिया है। जिस प्रकार से हमने योग को योगा के रूप मे परिवर्तित करके उसे बस शारीरिक व्यायाम तक सीमित कर दिया है उसी प्रकार से हमने धर्म को केवल जीवन शैली मात्र से जोड़कर देखना शुरू कर दिया है। धर्म कि व्याख्या कुछ शब्दों मे करके उसे सीमित कर दिया है और उसे ही सही रूप मे धर्म मान लिया ये परिवर्तन हुआ कैसे।

धर्म को हमने व्यक्ति और देश काल परिस्थिति के हिसाब से बंटवारा कर दिया है। जहां हम अपने जीवन चर्या मे अपने जीने के ढंग मे कुछ परिवर्तन करके अपने को अलग धर्म का घोषित कर रखा है। और यही हमारी सबसे बड़ी मूर्खता है। तो फिर प्रश्न उठता है कि फिर असली धर्म का अर्थ क्या है। असली धर्म से तात्पर्य एक समाज मे रह रहे सभी प्राणियों मध्य ऐसी जीवन शैली के अनुरूप नियम और धारणा का निर्माण करना जिससे सबके मध्य प्रेम सद्भाव रहे साथ ही एक परम सत्ता के प्रति लोग समर्पित रहे।

लेकिन समाज मे अलग दिखने के लिए कई तरह के धर्मों का निर्माण हुआ लोगो ने अपने हुलिये अपने खान पान रहन सहन मे परिवर्तित कर लिया और अपने को अलग धर्म का घोषित कर दिया लेकिन उन अलग अलग धर्मों के बताए आदर्शों और उनके नियम तथा विधानों के अनुरूप जीवन का अनुशरण किसी ने भी नहीं किया।

तो अब हम कह सकते है कि यदि हम धर्म की मूल भावना का जिसके अंतर्गत समाज मे समरसता बनाए रखना, सत्य, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी इत्यादि का अनुशरण करते हुए जीवन यापन करना, अगर इसका पालन नहीं कर सकते तो फिर धर्म परिवर्तन तो बस कल्पना मात्र ही है।

हाँ ये कह सकते है कि आप धर्म परिवर्तन न करके आप बस धर्मी अथवा अधर्मी हो सकते है। या तो आप अपने जीवन मे सत्य, ईमानदारी, प्रेम इत्यादि का अनुशरण करेंगे या फिर आप इसके इतर जीवन यापन करेंगे फिर तो आप केवल धर्मी अथवा अधर्मी ही कहलाएंगे। हां आज के अनुरूप जो धर्म परिवर्तन की परिभाषा है उसके अनुसार आप अपनी जीवन शैली अपना सामाजिक हाव भाव रहन सहन पहनावा बादल लेते है और इसे ही धर्म परिवर्तन के रूप मे देखते है।

इसमे हम दोनों पक्षों को बुद्धिहीन और विवेक हीन ही मानेंगे जो इस प्रकार के धर्म परिवर्तन करते या कराते है या फिर जो इस प्रकार के धर्म परिवर्तन का विरोध करते है।

सही मायने मे हम केवल धर्म का साथ देते या अधर्म का साथ देते है अब जो अधर्मी है वो कैसे भी अपने जीवन के दैनिक चर्या को संचालित कर सकता है। और जो धर्म का पालन करता है वो कैसे भी पहनावा रहन सहन खान पान रख सकता है या फिर अपने अनुरूप ईश वंदना या फिर ईश्वर की भक्ति कर सकता है।

कोई भी धर्म हो वो सभी सत्य की रह पर चलने ईमानदारी का अनुशरण करने जीवन मे लोगो के प्रति प्रेम सद्भाव और उनका साथ और सहयोग अपनाने अथवा देने का ही ज्ञान देते है और इसके साथ एक परम सत्ता के ध्यान उसको पाने का मार्ग दिखते है।

कमियाँ है तो हमारे सोच हमारे मानसिक संकीर्णता की जिससे हम इतने भावुक होकर इसका समर्थन और विरोध करने लगते है। न जाने कितनी तरह की कथाये हम सुनते है जिसमे हम कितने बड़े बड़े भक्त हुए जिन्होने अपने ढंग से ईश्वर का अनुशरण प्राप्त किया कोई हठ किया कोई भक्ति तो कोई प्रेम के जरिये लेकिन उन सबमे एक गुण सामान्य रूप से पाया गया उन्होने समाज को जोड़ने का प्रयास किया लोगो के मध्य प्रेम का संचार किया लोगो के लिए कुछ ने तो बलिदान भी दिया। तो फिर कहीं न कहीं हमारे सोच मे ही कुछ मैल लगा हुआ है।

अंत मे मै बस यही कहना चाहूँगा जो धर्म का पालन करता है वही धार्मिक है, फिर चाहे उनकी जीवन शैली कैसी हो मगर उनका उद्देश्य एक ही है। और उन सबको एक ही धर्म का अनुशरण कर्ता माना जाएगा। और वही दूसरी तरफ कोई कितना भी आडंबर करता हो यदि वो सीमित रूप मे धर्म की विवेचना करके लोगो के मध्य कलह करने का प्रयास कर रहा है तो फिर उसके पहनावे रहन सहन इत्यादि से भी वो धार्मिक नहीं कहलाएगा वो अधर्मी ही होगा।

और ऐसा कोई ही धर्म नहीं हो सकता है जिसकी रक्षा आप कर रहे हो फिर तो आप धर्म से श्रेष्ठ हो गए क्योंकि गीता ज्ञान देते समय भगवान श्री कृष्ण ने भी कहा है। जब भी धर्म पर कोई भी आंच आएगी वो स्वयं आएंगे और इस सम्पूर्ण सृष्टि मे परिवर्तन लाएँगे। तब तक हम केवल अपने धर्म का पालन करे जिसमे हम कर्म योग ज्ञान योग और भक्ति योग इन तीन के माध्यम से अपने जीवन का अनुशरण करें।

!!इति शुभम्य!!

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