देव दीपावली धरती पर स्वर्ग का एहसास- अयोध्या एवं वाराणसी

कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को हम सब दीपावली का त्योहार मानते है। मान्यता है कि इस दिन प्रभु श्रीराम लंका से अयोध्या वापस आते है और अमावस्या की काली रात होने के कारण दीपों से पूरे नगर को सजाया जाता है साथ ही साथ इसी तिथि को माता लक्ष्मी का अवतरण दिवस माना जाता है।

देवासुरों द्वारा इसी दिन समुद्र मंथन के उपरांत इस दिन ही माता लक्ष्मी प्रकट होती है। अतः इस कारण से भी हम सभी इस तिथि को दीपावली का प्रसिद्ध त्योहार मानते है। लेकिन आज हम बात करेंगे देव दीपावली की जिसका दृश्य बहुत ही मनोरम होता है।

मान्यता है कि जिस प्रकार हम मनुष्य दीपावली का पर्व मानते है उसी प्रकार देवताओं के लिए भी दीपावली मनाने की मान्यता है। और इसे ही देव दीपावली के रूप मे जानते है। सबसे प्राचीन देव दीपावली वाराणसी मे होता है। और अभी कुछ वर्षों से अयोध्या मे भी देव दीपावली का आयोजन किया जाता रहा है।

अयोध्या की देव दीपावली का नाम तो Guinness Book of World Record मे भी सबसे अधिक दिये जलाने के रूप मे दर्ज है। लगभग 5 लाख से भी ज्यादा दिये एक साथ इस देव दीपावली के आयोजन मे जलाए जाते है।

अयोध्या की देव दीपावली-

मान्यता है कि जब प्रभु श्रीराम, रावण का वध करते है तो देवताओं मे भी बहुत ही ज्यादा हर्ष का माहौल रहता है और इसी क्रम मे दीपावली से दो दिन पहले देव दीपावली का आयोजन आयोजन मे बड़े ही धूम धाम से होता है।

इस कार्यक्रम का आयोजन सरयू नदी के तट पर बने राम की पैड़ी नमक स्थान पर होता है। 5 लाख से भी अधिक दीयों को एक साथ राम की पैड़ी के घाटों पर प्रज्वलित किया जाता है।

सबसे पहले नवरात्रि के समय रामलीला का मंचन होता है तत्पश्चात कार्तिक मास मे दीपावली के 3 दिन पहले से ही देव दीपावली के कार्यक्रम का आयोजन की शुरुवात होती है।

जिसमे विभिन्न प्रकार की झाँकियाँ प्रस्तुत की जाती है। साथ ही साथ दूर दूर से लोग इस कार्यक्रम को देखने के लिए आते है।

हम सभी जानते है कि रामायण का मंचन कई देशों मे उनके स्वरूप के अनरूप होता है। इन्डोनेशिया, मलेशिया इत्यादि देशों मे रामायण की कथा वहाँ के देश काल परिस्थिति के अनुरूप रचित है और उनके देशों के कलाकार देव दीपावली के कार्यक्रम मे आकार यहाँ अपने देश के रामायण का मंचन झांकियों के जरिये करते है।

ये झाँकियाँ सम्पूर्ण अयोध्या का भ्रमण कर के राम की पैड़ी पर पहुँचती है साथ ही साथ विभिन्न देशों के लोग वहाँ के लोक संगीत और नृत्य का मंचन भी इन झांकियों के जरिये करते है। तत्पश्चात संध्या के समय लोग राम की पैड़ी पर पहुँच कर दीयों को एक साथ प्रज्वलित करते है।

और राम के अयोध्या आगमन के कार्यक्रम का मंचन भी कलाकारों द्वारा किया जाता है। और भी भिन्न भिन्न कार्यक्रमों के द्वारा संध्या को गुलजार किया जाता है।

वाराणसी की देव दीपावली-

अब हम बात करेंगे प्राचीनतम देव देपावली का जो कि न जाने कितने वर्षों से वाराणसी मे आयोजित होता रहा है। यहाँ लगभग 80 घाट गंगा के किनारे है। देव दीपावली जो कि कार्तिक मास की पुर्णिमा की तिथि को आयोजित होता है उस दिन सभी लोग मिलकर हर घाट को दीयों से सजाते है।

इसके साथ ही साथ सभी घाटों पर कार्यक्रमों का मंचन होता रहता है। और लोग घाटों पर इनका दिव्य अनुभव प्राप्त करते है। इनमे से सबसे प्रमुख घाट है हरिश्चंद्र घाट, मणिकर्णिका घटा, दशाश्वमेध घाट और अस्सी घाट इनपर विशेष प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। और पूरी रात देखने के लिए लोगों का तांता लगा रहता है।

खासकर मुख्य घाटों पर होने वाली गंगा आरती के समय का सभी को इंतज़ार रहता है। जो अलौकिक दर्शन इस दिन गंगा आरती का देखने को मिलता है। जिसे देखकर रोम रोम प्रफुल्लित हो जाते है।

वाराणसी की देव दीपावली बहुत ही प्राचीनतम कार्यक्रम है। और इस आयोजन को देखने के लिए बहुत ही दूर दूर देशों से लोग महीने भर पहले से आ जाते है।

वाराणसी की देव दीपावली का अगर आनंद पूरी तरह से लेना हो तो कुछ दिन पहले ही आकर बजड़े अथवा नाव की बूकिंग करा ले इस दिन नाव पर बैठकर गंगा मे से जो दृश्य देखने को मिलता है उससे मनोहारी दृश्य की हम कल्पना भी नहीं कर सकते है।

लोग पूरी रात उन नावों और बजड़ों पर आनंद का अनुभव करते रहते है। और ये वहाँ से गंगा जी की आरती देखने का जो आनंद प्राप्त होता है। वो शब्दों मे बयान नहीं किया जा सकता है।

सार-

कुछ कार्यक्रम, त्योहार और उत्सव ऐसे होते है जो हमारे संस्कृति के बारे मे बताती है। और हंसभी को इन कार्यक्रम का अनुभव प्राप्त करना चाहिए। घर के बच्चों को अवश्य इन कार्यक्रमों के बारे मे अनुभव करना चाहिए जिससे उन्हे पता चल सके की हमारी संस्कृति कितनी समृद्ध और विशाल है।

इन कार्यक्रमों से जुड़ी कहानियाँ उनके साथ साझा की जानी चाहिए। मेरा मानना है कि यदि एक बार कोई इस देव दीपावली जैसी मनोहारी दृश्य को देख ले तो उसकी छाप उसके मन से मरते डैम तक नहीं मिट सकती है।

इस बार कोरोना काल मे इन कार्यक्रमों का आयोजन तो होगा लेकिन शायद प्रशासन द्वारा सभी को इन कार्यक्रम मे शामिल होने का आदेश न मिले और ऑनलाइन ही इनका प्रसारण किया जाये लेकिन एक बार अवश्य जब भी स्थिति सामान्य हो तो अवश्य पूरे परिवार के साथ इन कार्यक्रमों का आनंद अवश्य प्राप्त करे। और एक आध्यात्मिक एवं शांति का अनुभव प्राप्त करें।

||इति शुभम्य||

Leave a Comment