एक नहीं पाँच दिवसीय है दीपावली महापर्व- जानिए विस्तार से

कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को भारतीय सनातन समुदाय के द्वारा दीपावली के पर्व का आयोजन किया जाता है। उस दिन हम सभी प्रकाशोत्सव का आयोजन बड़ी धूम धाम से मानते है। लक्ष्मी पूजन गणेश पूजन और धन के देवता कुबेर का पूजन हम बहुत ही विधि विधान से करते है।

दीपों के जरिये पूरे घर को सजाते है। मिठाई और अन्य फल इत्यादि का एक दूसरे को आदान प्रदान करते है। लेकिन क्या आप जानते है दीपावली का महापर्व एक दिन का पर्व नहीं बल्कि पाँच दिनों का महापर्व है।

तो आज हम इन्ही पाँच दिनों की चर्चा विस्तार से करेंगे और जानेंगे इन पाँच दिनों मे पूजन, अर्चना और आयोजन कैसे किया जाये जिससे माता लक्ष्मी एवं प्रथम पूज्य गणेश जी का आशीर्वाद हम सभी पर हमेशा बना रहे।

रमा एकादशी-

एकादशी तिथि के बारे मे हम सभी जानते है। सभी तिथियों मे इस तिथि को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। और हम सभी जानते है कि एकादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु की आराधना करने का एक विशेष महत्व है।

लेकिन कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन माता लक्ष्मी की आराधना वंदन का एक विशेष विधान है। रमा नाम माता लक्ष्मी का ही एक अन्य नाम है और इस दिन माता लक्ष्मी की विशेष आराधना एवं पूजन के उपरांत ही हमे दीपावली पर्व की शुरुवात माननी चाहिए।

धनतेरश (धन त्रयोदशी)-

अब आते है हम अपने शीर्षक की विषय वस्तु पर। दीपावली पर्व की शुरुवार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन से ही मनी जाती है। मान्यता है कि इसी दिन देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन के उपरांत धन्वन्तरी उत्पन्न हुए थे जिनको आरोग्य के देवता के रूप मे भी जाना जाता है।

और दीपावली की शुरुआत इसी दिन से की जाती है। ढंटेराश के दिन लोग खरीददारियाँ भी करते है जिसके अनुसार घर मे नए समान लाये जाते है कोई सोने चाँदी की खरीद करता है कोई नए वहाँ इत्यादि खरीदता है। और कुछ लोग इस दिन निवेश भी करते है।

सुख समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन पुजा की शुरुआत की जाती है। नए दिये जलाए जाते है। और भगवान धन्वन्तरी एवं माता लक्ष्मी की पुजा अर्चना की जाती है।

नरक चतुर्दशी एवं हनुमान जयंती-

धनतेरश के दूसरे दिन यानि की चतुर्दशी तिथि को उत्तर भारत के क्षेत्र मे श्री राम भक्त हनुमान जी की जयंती के रूप मे मनाया जाता है। और इस दिन लोग व्रत इत्यादि के रूप पूरा दिन व्यतीत करते है और रात्री मे श्री हनुमान जी का जन्मोत्सव बड़े ही धूम धाम से मनाते है।

तथा इसे नरक चतुर्दशी के भी नाम से जाना जाता है इसके पीछे प्रसंग है कि एक समय की बात है नरकासुर नाम का राक्षस होता है जो विभिन्न देशो के राजाओं को युद्ध मे पराजित करके उनकी स्त्रियॉं को बंदी बना कर रखता है। और भगवान श्री कृष्ण आज के दिन ही उस नरकासुर का वध करके उन स्त्रियॉं को छुड़ाते है।

साथ ही इसके पीछे एक रहस्य और भी जुड़ा है जब श्री कृष्ण सभी स्त्रियॉं को छुड़ाते है तो उनके घर के लोग उन स्त्रियॉं को अपनाने से माना कर देते है जिस पर भगवान श्री कृष्ण उन्हे अपनी शरण देते है। और उन्हे अपनी पटरानी का दर्जा देते है।

और इसी कारण से माना जाता है कि श्री कृष्ण की लगभग 16000 रानियाँ थी। लेकिन इसके पीछे का रहस्य नहीं जानते की श्री कृष्ण ने उन्हे अपनी पटरानी का दर्जा देकर समाज मे एक सम्मान पूर्वक जीवन जीने का वर प्रदान किया था।

मुख्य दीपावली पूजन-

इसके बाद अमावस्या तिथि को आती है प्रमुख दीपावली पूजन का दिवस। इस दिन तो सुबह से ही सम्पूर्ण समाज मे हर्षोल्लास का माहौल रहता है लेकिन दीपावली पूजन का सही शुभारंभ होता है।

संध्या के समय मे जब संध्या के समय घर के सभी लोग मिलकर माता लक्ष्मी और श्री गणेश और माता सरस्वती की पुजा अर्चना करते है और उनसे घर मे सुख समृद्धि और शांति बनाए रखने की प्रार्थना करते है।

दीपावली के दिन कुछ बातों का ख्याल रखना अति आवश्यक होता है सबसे प्रमुख बात ये है कि इस दिन किसी से भी गुस्से अथवा ऊंची आवाज मे बात न करे सबके साथ प्रेम पूर्वक व्यवहार करे। घर मे विशेष प्रकार से साफ सफाई बनाए रखे। परिवार के साथ मिल जुल कर समय व्यतीत करे।

संध्या के समय परिवार के सभी सदस्य मिलकर माता लक्ष्मी का पूजन करे और उनसे प्रार्थना करे। बच्चों को खास रूप से उनकी पाठ्य पुस्तकों को लेकर माता लक्ष्मी और देवी सरस्वती का ध्यान करके पढ़ाई करने को कहे क्योंकि मान्यता है कि दीपावली के दिन बड़े बड़े सिद्ध पुरुष अपनी सिद्धियों को जागृत करते है।

अतः ये दिन बच्चों को अपनी पाठ्य पुस्तके पढ़ने से उनकी पढ़ाई मे और भी मन लगेगा और विद्याध्ययन की शक्ति प्राप्त होगी। इस दिन रात्री जागरण करने का भी विधान है मान्यता है कि इस दिन माता लक्ष्मी सभी के घरों मे जाकर उनके घरों का निरीक्षण करती है और जहां लोग दीपक को बूझकर सो जाते है या फिर जिन घरों मे माता लक्ष्मी का स्वागत नहीं होता है उन घरों से वो रुष्ट हो जाती है।

अन्नकूट एवं कलम दवात पूजन-

दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट और कलम दवात पूजन के आयोजन की मान्यता है। अन्नकूट के अनुसार उस दिन कई सारे व्यंजन खासकर 56 भोगों का निर्माण कर भगवान के सामने प्रस्तुत किया जाता है और भोग लगाने के बाद सब लोग मिल बाँट कर उसे प्रसाद के रूप मे ग्रहण करते है।

56 भोग का प्रबंध करना सब किसी के लिए मुमकिन नहीं है। तो हर कोई अपने सामर्थ्य अनुसार पकवान बनाकर भोग लगा सकते है। इसी दिन कायस्थ समाज के लोग कलम दवात की पुजा करते है। पहले के समाज मे कायस्थ समाज मूलतः हिसाब किताब का काम करते थे और इसीलिए दीपावली के दूसरे दिन ये अपनी लेखनी की पुजा करते है। साथ ही साथ अपने इष्ट देव चित्रगुप्त महाराज की भी पुजा अर्चना करते है।

भैया दूज-

पांचवे दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि के दिन भैया दूज और गोवर्धन पुजा का महात्म्य उत्तर भारत मे बहुत अधिक है इस दिन बहने अपने भाइयों के लंबी उम्र के लिए पुजा का आयोजन करती है।

मान्यता है कि इस दिन भाई बहन दोनों यदि यमुना नदी मे एक साथ डुबकी लगाए तो उनपर अकाल मृत्यु का शाया खत्म हो जाता है। क्योंकि यमुना मैया यमराज की बहन है और यमुना मैया मे स्नान उपरांत उनकी पुजा और यमराज देव की पुजा करने से जीवन मे अकाल मृत्यु का भाय खत्म हो जाता है।

सार-

दीपावली का पर्व एक ऐसा महापर्व है जो बहुत सारी लिखित और अलिखित कथाओं से जुड़ा हुआ है। इसके बारे मे एक लेख के द्वारा सबकुछ बताना मुमकिन नहीं है। क्षेत्र के अनुसार बहुत सारे किस्से और प्रसंग सुनने को मिलता है।

लेकिन अगर उद्द्येश्य की बात की जाये इन सभी क्षेत्रों मे इस महापर्व का आयोजन केवल इसी रूप मे किया जाता है कि अंधार पर हमेशा उजाले और प्रकाश की विजय हो समाज और परिवार मे सुख समृद्धि और खुशहाली बनी रहे।

तो आइये इस बार भी दीपावली का पर्व का आयोजन करे सभी मिलजुल कर इस त्योहार को मनाए और एक दूसरे से प्रेम भाईचारे का आदान प्रदान करे। एवं समाज मे भाईचारा प्रेम और सौहार्द्य का प्रचार प्रसार करें।

||इति शुभम्य||

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