सनातन धर्म के महान दानवीर- कथा प्रसंग

दानवीर

सनातन धर्म में या फिर भारतीय संस्कृति मे दान की महत्ता बहुत ही अधिक है। शुरू से ही हमे दान और धर्म के बारे मे बताया जाता है। और दान को सर्वोत्तम पुण्य की श्रेणी मे रखा जाता है। लेकिन दान के कई प्रकार होते है। एक दान होता है अपने लाभ का सोच कर किया गया दान जिस श्रेणी के अंतर्गत सभी दान करते है। और द्वितीय श्रेणी है। बिना किसी फल और परिणाम के दान की प्रवृत्ति जिसमे उन महान लोगो का नाम आता है जो बिना कुछ सोचे समझे दान करते है जिसे वो अपना फर्ज समझ कर दान करते है। आज इस लेख के जरिये हम जानेंगे सनातन धर्म के महान दानवीर के बारे में।

राजा बलि- राजा बलि असुरों के महान राजा के नाम से जाने जाते है। इनके पिता का नाम विरोचन था। और ये महान विष्णु भक्त प्रह्लाद के पोते थे। वैसे तो ये असुरों के राजा थे लेकिन बहुत ही बड़े पुण्यात्मा और धर्मात्मा पुरुष थे। इनहोने कई अश्वमेध यज्ञ और महान धार्मिक कृत्यों का आयोजन किया था। जिससे की ये तीनों लोकों के अधिकार हो गए थे। इनके धर्म कर्म के कारण स्वर्ग के राजा इन्द्र और अन्य देवता इनसे दर गए और उन्हे डर लाग्ने लगा कहीं ये स्वर्ग पर पूर्ण आधिपत्य न प्राप्त कर ले और देवताओं से भी उच्च हो जाये।

इसके निवारण हेतु सभी देवी देवता देवराज इन्द्र के साथ ब्रह्म देव के पास पहुँचते है। और अपनी समस्या उन्हे बताते हैं। इसपर ब्रह्मदेव सभी देवी देवता को श्री विष्णु के शरण मे जाने को बोलते है। सभी देवी देवता अपनी गुहार लेकर श्री हरि के पास पहुँचते है। और श्री हरि उन्हे उन्हे इस समस्या के निवारण हेतु आश्वासन देते हैं। और वामन देव का अवतार लेकर असुर राज बलि के द्वार पर पहुँच जाते है। वामन देव को देखकर राजा बलि उनको प्रणाम करते है और उनका सम्पूर्ण सत्कार करते है और वामन देव से आग्रह करते है कि भिक्षा के रूप मे क्या चाहिए इसपर वामन देव बोलते है कि उन्हे अपनी ताप तपस्या के लिए केवल तीन पग जमीन की आवश्यकता है। इसपर राजा बलि बोलते है आप खुद ही अपना 3 पग जहां रखना है रखे वो जमीन आपकी हो जाएगी। और वामन देव जो कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार है आना चमत्कार दिखते है।

वामन देव 2 पग मे ही तीनों लोकों को नाप लेते है। और राजा बलि से पूछते है कि मई अपना तीसरा पग कहाँ रखू और राजा बलि बिना कुछ विचार किए ही अपना मस्तक उनके पैरो में कर देते है और बोलते है तीसरा पग आप हमारे मस्तक अपर रखे और मई सर्वस्व अपने को आप को देता हूँ। इसपर श्री विष्णु उनसे प्रसन्न होते है। और राजा बलि को वैकुंठ मे स्थान प्रदान करते है।

राजा हरिश्चंद्र- सूर्यवंशी राजा हरिश्चंद्र का नाम तो सभी महान दानियों के रूप मे जाना जाता है। राजा हरिश्चंद्र ने अपना सर्वस्व दान कर दिया था और नाम सभी कालो मे आजार अमर कर लिया। राजा हरिश्चंद्र ने महर्षि विश्वामित्र की सेवा मे अपना राज पात सबकुछ उनको दान कर दिया और जब उन्होने दक्षिणा स्वरूप उनसे कुच्छ देने को मांग की तो उन्होने अपने को कालु डोम को बेचकर उनकी दक्षिणा का भार चुकाया यहाँ तक कि उन्होने कालु डोम के सेवक के रूप मे उनके यहाँ काम किया और श्मशान घाट पर काम किया। आज भी हम वाराणसी के हरिश्चंद्र घाट पर ये कथा सुनते आते है। जहां पर बताया जाता है कि स्वयं राजा हरिश्चंद्र ने काम किया था। और स्वयं अपनी पत्नी से उनके पुत्र के अंतिम संस्कार के लिए शुल्क चुकाने की बात कही थी। राजा हरिश्चंद्र के इस समर्पण भाव को देखकर महर्षि विश्वामित्र बहुत खुश हुए और उन्हे सबकुछ वापस किया और युगों युगों तक उनके महान सत्यवादी और दानी राजा के रूप मे विख्यात रहने का आशीर्वाद दिया।

सूर्य पुत्र कर्ण- महाभारत की कथा मे सूर्य पुत्र कर्ण को महानि दानी के रूप मे व्याख्यायित किया जाता है। कर्ण का जन्म सूरी के आशीर्वाद से हुआ था और उस समय कुंती विवाहित नहीं थी अतः लोक लाज के डर से उन्होने कर्ण को त्याग दिया था। प्रसंग है कि सूर्य पुत्र कर्ण इतने बड़े दानी थे कि उन्हे मालूम था कि यदि वो उनके पिता से प्राप्त कवच कुंडल को त्याग देंगे तो महाभारत युद्ध मे उनकी मृत्यु निश्चित है फिर भी देवराज इन्द्र को वो उसे दान कर देते है। और जब कुरुक्षेत्र के रणभूमि मे कर्ण मृत्युशैया पर पड़ा था तो श्री कृष्ण ने उनकी परीक्षा लेने की सोची। और एक ब्राह्मण का भेष लेकर कर्ण दे दान मांगने उसके पास गए मृत्यु शैय्या पर भी कर्ण मे अपने सोने के दाँत को ब्राह्मण को दान किया और युगों युगों तक महान दानी के रूप मे महान हो गए।

अन्य दानवीर- बहरतीय संस्कृति और सनातन धर्म मे दानवीरों की सूची कभी भी कम नहीं हो सकती है। उपरोक्त के अलावा भी बहुत सारे दानी इस धरती पर हुए जिनके दान को कभी भी कमतर नहीं आँका जा सकता है। जिसमे महात्मा शिवि जो कि एक एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपने शरीर के समस्त अंगों का दान कर देते है।
एकलव्य जो कि गुरु दक्षिणा प्रदान करने हेतु अपना अंगूठा अपने गुरु को प्रदान कर देते है। ऐसे गुरु को जिन्होने कभी भी प्रत्यक्ष रूप मे उन्हे शिक्षा नहीं दी। उनके एक बार कहने भर से उन्हे अपना अंगुनथा जिसमे उनकी समस्त प्रतिभा समाहित होती है उसे दान कर देते है। जीवनपर्यंत ऐसे व्यक्ति के त्याग को हम नकार नहीं सकते है।
महर्षि दधीचि जिन्होने देवताओं को असुरों से युद्ध मे विजयी होने हेतु अपने सम्पूर्ण शरीर का दान देते है। और उनकी हड्डियों से महान अस्त्र वज्र का निर्माण होता है। जिससे देवताओं का असुरासुर युद्ध मे विजय होती है। इस कथा को विस्तार से जानने के लिए पढे गौ पूजन का महत्व- जाने क्यों होती है गाय की पूजा

निष्कर्ष

सनातन धर्म मे दान पूजन दक्षिणा इत्यादि का बहुत ही ज्यादा महत्व है। और बहुत सारे ऐसे प्रसंग और कथाएँ है जिनमे हम महान लोगो के दान की कटाये सुनते आ रहे है। जिन्होने अपने लाभ इत्यादि की परवाह किए बगैर दान के कर्तव्य का वहाँ किया और युगों युगों तक अमर हो गए। दान का महत्व हमारे समाज मे बहुत ही अधिक है। और इसे धर्म के पालन के रूप मे महत्वपूर्ण अवयव माना जाता है। उपरोक्त कथाओं के जरिये हम दान के महत्व को देख सकते है। और इसे अपने जीवन मे अपनाने का प्रयास कर सकते है।

||इति शुभम्य||

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