जीवन में दान पुण्य और मन्नत का महत्व

भारतीय समाजिक जीवन में दान पुण्य और मन्नत का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। हमारे देश में धर्म का अनुशरण करने वाला हर कोई प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में दान और मन्नत का कोई न कोई स्थान अवश्य है।

हम अपने जीवन में सुख की कामना करते हुए दान करते है। एवं उसके बदले में सुखी जीवन की कामना करते है। ये कामना ही कही न कही मन्नत का रूप ले लेती है। जब भी हम कोई पुण्य का काम करते है तो किसी न किसी रूप में उस पुण्य के बदले में कामनाए हमारे मन मस्तिष्क में जन्म लेती है।

इस लेख के द्वारा हम जानने का प्रयास करेंगे की दान और मन्नत का हमारे जीवन में क्या उपयोगिता है तथा इनका हमारे जीवन में क्या महत्व है।

दान, पुण्य और मन्नत की उपयोगिता-

संसार का हर प्राणी एक सुखी और आनंददायक जीवन की कामना करता है।और अपने जीवन में मिलने वाले सुख दुख को अपने किए और पाप के आधार पर आकलन करता है। दान भी इसी पुण्य की श्रेणी में आता है।

आज कल के समय में व्यक्ति देवस्थान दर्शन हेतु जाता है। या कोई पुजा अर्चना या यज्ञ इत्यादि करता है तो इसे पुनि के रूप में देखा जाता है। और इस पुण्य के बदले में व्यक्ति जब कोई कामना रखता है तो उसे हम मन्नत के रूप में देखते है।

आज तो लगभग सभी प्राणी ईश वंदना या फिर कोई पुण्य का काम केवल अपनी कामना की पूर्ति हेतु करते है। अतः हम कह सकते है हमारे जीवन में दान और पुण्य की उपयोगिता तो है। लेकिन इसके बदले हमेशा किसी कामना को बनाए रखना इसकी उपयोगिता को कम कर देता है।

दान, पुण्य और मन्नत की महत्ता गीता के परिपेक्ष्य में-

गीता में कर्म और कर्मफल का वर्णन बहुत ही विस्तार से किया गया है। गीता को कर्म ग्रंथ के रूप में भी जाना जाता है। हमे इस भौतिक जगत में रहते हुए जिस प्रकार के कर्मो का निर्वाह करना चाहिए।

और उनके बदले किसी फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए इसके बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है। गीता के ज्ञान के आधार पर हम दान, पुण्य और मन्नत की सही व्याख्या कर सकते है। गीता के सूत्रों के द्वारा हम बोल सकते है कि दान और पुण्य को गीता के द्वारा उपयोगी माना जा सकत है। दान और पुण्य हमारे कर्म योग का एक अंग है।

इसके द्वारा हम अपने कर्तव्यों के प्रति बहुत दृढ़ होंगे और समाज में समरसता बनाए रखने में सहयोग देंगे। वही अगर मन्नत की बात की जाये तो इसका गीता के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से निषेध किया जाता है।

जिस प्रकार गीता में कर्म फल को लेकर चिंतित न होने की बात की जाती है और केवल कर्म के प्रति दृढ़ होने की बात की जाती है। उसी प्रकार बोल सकते है कि मन्नत भी किसी न किसी रूप में कर्मफल का एक रूप है और हमे इससे बचने का प्रयास करना चाहिए।

मन्नत, स्वार्थ और प्रलोभन की जननी-

मन्नत किसी न किसी रूप में स्वार्थ को जन्म देती है। अगर हमारे सभी कर्म किसी न किसी उचित परिणाम की कामना के साथ होते है तो वो हमारे मन मस्तिष्क में स्वार्थ को पनाह देती है।

जब हम अपने जीवन में आनंद और सुख की कामना करते है तो हमे उसे हमे परिणाम के रूप में नहीं देखना चाहिए और जो कुछ भी हमे प्राप्त होता है उसे सहर्ष रूप से ग्रहण करना चाहिए। उदाहरण स्वरूप हम किसी देव स्थान में दर्शन हेतु जाते है।

तो हम मन्नत और स्वार्थ बस उसी ईश्वर को प्रलोभन देने लगते है जिससे हम सुख आनंददायक जीवन की कामना करते है।

ये बहुत ही अनुचित लगता है कि जिससे हम अपने समस्त सुखो की कामना करते है उसे ही हम उन सुखो के बदले में कुछ लौटने का प्राण करते है और यही मन्नत का रूप ले लेता है।

साधारण शब्दों मे कहे कि जो माता पिता अपने संतान के पालन पोषण कि ज़िम्मेदारी रखते है तो क्या उसके बदले में संतान अपने माता पिता को कुछ प्रलोभन देते है। नहीं तो फिर उस परम पिता परमेश्वर से हम यदि सुखमय जीवन की बात रखते है तो हम उन्हे प्रल्प्भन देते है ये कहा तक उचित रहता है।

दान, पुण्य के बदले इच्छा, अनैतिक-

नीतिशास्त्र के अनुसार जब हम कोई अच्छा कृत्य करते है और उसके बदले कोई इच्छा मन मस्तिष्क में उत्पन्न होती है तो उस अच्छे कृत्य का फल निष्क्रिय हो जाता है।

उदाहरण स्वरूप जब हम किसी जरूरतमन्द व्यक्ति की सहायता करते है तो हमारे मन में उसकी की गई सहायता के बदले में यदि कोई कामना हमारे मन में उत्पन्न होती है तो हमारे द्वारा किए गए अच्छे कृत्य का फल नहीं बचता।

इसी प्रकार हमे अपने द्वारा किए गए दान और पुण्य के बदले किसी प्रकार की कोई कामना या इच्छा नहीं रखनी चाहिए बल्कि इसे अपना कर्तव्य मानते हुए करते रहना चाहिए।

निष्कर्ष

मानव स्वभाव के अनुसार इस धरती का हर प्राणी इच्छाओं और कामनाओं से बंधा हुआ है। उपरोक्त कथनो से ये नहीं समझना चाहिए कि हैममे कामना या इच्छा नहीं होनी चाहिए। इच्छा और कामना हमे प्रफुल्लित सुखमय जीवन जीने के लिए अति आवश्यक है।

लेकिन अपने किए दान, पुण्य के बदले हर वक्त एक कामना के प्रति दृढ़ रहना हमारे लिए बिल्कुल भी उचित नहीं है। अपने धर्म और कर्म दोनों का पालन करते वक्त उसे अपना कर्तव्य मानते हुए उसका अपना पालन करना चाहिए।

इसी प्रकार यदि किसी देवस्थान जाते हुए, ईश वंदना करते वक्त या फिर दान पुण्य करते वाकते अगर हम मन्नत रखते है तो कहीं न कहीं हम सीमित जीवन कि इच्छा रखते है। बल्कि अगर दान पुण्य करते वक्त उसे अपना कर्तव्य पालन के रूप में देखे तो ईश्वर की कृपा हमपर सदैव बनी रहेगी।

अंत में कह सकते है स्वार्थ की भावना के साथ किया गया पुण्य, दान का कोई भी मूल्य नहीं और मन्नत और इच्छा पूर्ति हेतु प्रलोभन हमारे जीवन के सुख शांति को सीमित करते है।

!इति शुभम्!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *