चोर की चतुराई ने बचाई उसकी जान- कहानी

chor ki chaturai- Kissa Kahani

पुरानी किस्से कहानियों मे बहुत सारी शिक्षा रहती है और आज से कुछ साल पहले जब internet और तकनीकी का इतना बोल बाला नहीं था तो किताबों मे लिखी कहानियों के जरिये ही अच्छी अच्छी बाते सीखते थे।

आज सहसा मुझे अपनी कक्षा मे पढ़ी एक संस्कृत कहानी की याद आ गई जिसे हम हितोपदेश की कहानी के रूप मे जानते है। इस कहानी मे हम एक चोर की सूझ बुझ को देखेंगे जिससे अपने प्राणों की रक्षा करता है। और सम्पूर्ण समाज को एक प्रकार की शिक्षा भी देता है।

एक समय की बात है कि किसी नगर मे उस नगर का एक राजा रहता है। वो राजा बहुत ही धर्मनिष्ठ, न्यायप्रिय और बुद्धिमान एवं विद्वानो जनों का सम्मान करने वाला रहता है। उस राज्य की प्रजा अपने राजा से बहुत प्रसन्न रहती है। उसका प्रशासन और उसकी न्यायप्रियता सभी को बहुत अच्छी लगती है।

एक बार उस नगर मे एक धनी सेठ के घर मे चोरी होती है और उसके घर से बहुत सारा धन और हीरे जवाहरात चोरी हो जाते है। चोरी की घटना की दुहाई लेकर सेठ राजा के पास पहुंचता है। और राजा से न्याय की गुहार लगता है।

राजा अपने सेनापति को जल्द से जल्द चोर को पकड़ने का आदेश देते है सेनापति की कुशलता के कारण जल्द ही चार चोर पकड़े जाते है। राजा के सामने वो अपने गुनाह काबुल कर लेते है और चोरी के समान की बरमदगी भी करा देते है।

लेकिन राजा को अपने राज्य मे चोरी की घटना आघात करती है और वो सभी चोरो को मौत की सजा सुनता है उन्हे फांसी के फंदे पर लटकाने का आदेश देता है।

उन सभी चोरो को एक एक करके फांसी के फंदे पर लटकाया जाता है तीन चोरो को फांसी पर लटकाने के उपरांत जब चौथे चोर की बारी आती है तो वो राजा से बोलता है यदि आप मुझे फांसी की सजा से मुक्त करेंगे तो मै आपको एक दिव्य ज्ञान दूंगा जो आपके और आपकी प्रजा के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध होगी।

इतना सुनने के बाद राजा उस चोर की सजा को रोक देता है और उससे पूछता है आखिर उसके पास कौन सा दिव्य ज्ञान है इसपर वो चोर बोलता है कि मुझे सोना उगाने की विद्या आती है। और ये विद्या वो उन्हे देना चाहता है।

राजा खुश हो जाता है और उसे वो विद्या बताने को कहता है तो तो चोर बोलता है मुझे सोने उगाने की विद्या तो आती है लेकिन मै उसे उगा नहीं सकता उसके लिए एक खास व्यक्ति की आवश्यकता है इस पर राजा बोलता है किस प्रकार के व्यक्ति की आवश्यकता है।

चोर बोलता है जो व्यक्ति जीवन मे कभी भी छोटी या बड़ी किसी भी प्रकार की चोरी नहीं किया होगा वही इस विद्या को यथार्थ कर सकता है। तो आप ऐसा व्यक्ति बता दीजिये मै उसे वो विद्या सीखा दूंगा।

राजा अपने सेनापति से पूछता है सेनापति बोलता है महाराज मैंने बचपन मे अपने घर मे मिठाई चुराई है। एक एक करके राजा सभी से पूछता है और सभी का जवाब यही रहता है कि उन सभी ने जीवन मे कभी न कभी चोरी की हुई है।

अंत मे राजा भी बोलते है कि उन्होने भी अपने जीवन मे चोरी की हुई होती है। तब चोर बोलता है महाराज चोरी तो चोरी होती है फिर चाहे छोटी हो या बड़ी पाप की श्रेणी मे ही आता है। फिर केवल मुझे ही फांसी क्यों।

राजा उस चोर की कुशलता और बुद्धिमता को समझ जाता है। और उसकी सजा को माफ कर देता है और उस चोर को सम्मान के साथ अपने सलाहकार समिति मे सदस्य बना देता है।

इस प्रकार से चूर ने अपनी चतुराई से अपनी जान भी बचाई और एक सम्मान जनक जीवन को उफार रूप प्राप्त किया है।

तो दोस्तो आपको ये कहानी कैसी लगी हमे बताए और ऐसी ही कहानी, और अन्य लेखों के लिए हमसे जुड़े रहें।

!!इति शुभम्य!!

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