बढ़ते आयु के आधार पर बच्चों का व्यक्तित्व विकास और समाज का प्रभाव

बढ़ते आयु के आधार पर बच्चों का व्यक्तित्व विकास और समाज का प्रभाव- महान पाश्चात्य दार्शनिक जॉन लॉक नए जन्मे शिशु के मस्तिष्क की तुलना Tabula Rasa (खाली स्लेट) से की थी। उनके अनुसार जब एक शिशु जन्म लेता है तो उसका मस्तिष्क एकदम रिक्त होता है। और जिस प्रकार शिशु का शारीरिक विकास होता है। उसी क्रम में उसके मस्तिष्क का विकास भी होता है। इसका तात्पर्य है कि एक शिशु जब जन्म लेता है तो उसके मस्तिष्क में चेतना तो होती है लेकिन विचारों का जन्म नहीं हुआ रहता।

समय के साथ ही शिशु के मस्तिष्क में विचारों का जन्म होता है और उन्ही विचारों के आधार पर वो अपना जीवन जीता है। तथा इन विचारों का जन्म उसके आस पास के परिवेश पर निर्भर करता है। इसीलिए इस लेख के द्वारा हम जानने का प्रयास करेंगे के एक शिशु और उसके बढ़ती आयु के क्रम में उसमे विचार कहा से आते और समाज का उस पर क्या प्रभाव होता है।

जन्म पूर्व से किशोरावस्था में पहुँचने तक- उपरोक्त सहशीर्षक को देखने के बाद भ्रम में आने की आवश्यकता नहीं। देखा जाये तो वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह सिद्ध हो चुका है कि जन्म से पूर्व गर्भ में ही शिशु का व्यक्तित्व निर्माण होना शुरू हो जाता है। इसीलिए चिकित्सको द्वारा भी गर्भवती स्त्री को अच्छे और खुशनुमा माहौल मे रहने की सलाह दी जाती है। अतः यदि एक शिशु के मस्तिष्क पर सबसे पहला प्रभाव जन्म से पूर्व माँ के रहन सहन और खान पान इत्यादि का पड़ता है। पहले के समय में भी गर्भवती महिला को उसके पास अच्छे अच्छे चित्र इत्यादि रखने का सलाह दिया जाता था तथा साथ ही साथ अच्छी पुस्तकों का अध्ययन करने को भी बोला जाता था।

जन्म के उपरांत किशोरवस्था तक प्रायः शिशु केवल अपने परिवार के आस पास अपना समय गुजारता है। पश्चिमी सभ्यता में किशोरावस्था को Teen शब्द से संबोधित किया जाता है। Teen शब्द से तात्पर्य उस आयु से है। जिस आयु को अङ्ग्रेज़ी के शब्दो मे Teen शब्द से खत्म किया जाता है (Thirteen to Nineteen) उस आयु वर्ग को Teen Age के नाम से जाना जाता है।

अतः लगभग बारह वर्ष की आयु तक शिशु पर अपने परिवार का प्रभाव होता है। और यही वो आयुकाल है जिसका प्रभाव इंसान पर अपने सम्पूर्ण जीवन मे बना रहता है। अतः इस समय में अपने परिवार के द्वारा प्राप्त जो विचार शिशु के मस्तिष्क में उत्पन्न होते है। उनका प्रभाव सबसे ज्यादा मनुष्य पर पड़ता है। तथा वो विचार जीवन भर इंसान में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में उपस्थित रहते है।

किशोरावस्था से युवावस्था में पहुँचने तक- द्वितीय चरण बहुत ही महत्वपूर्ण चरण होता है जिसमे बच्चे के मन और शरीर में बहुत ही ज्यादा बदलाव होता है। जिसके साथ ही साथ बच्चे के विचारों में भी बहुत तेजी से परिवर्तन होने की संभावना होती है। इस उम्र में बच्चा अपने परिवार के साथ समय बिताना कम करके अपने मित्र और सहपाठियों के साथ समय बिताना ज्यादा कर देता है।

तथा यही वो उम्र है जिसमें बच्चे के मस्तिष्क मे नए विचार उनके सहपाठियों एवं मित्रों के सहयोग से उत्पन्न होने लगते है। तथा पूर्व में जो विचार बच्चे के मस्तिष्क में उसके परिवार के द्वारा प्राप्त हुए है उन पर भी नए विचारों के द्वारा अतिक्रमण शुरू होने का भी डर रहता है। अतः यही वो आयुकाल है जिसमे अच्छे विचारों और व्यक्तित्व के निर्माण हेतु बच्चों को अच्छे मित्र और सहपाठी के संगत की सलाह दी जाती है। जो उन्हे भविष्य में एक उज्जवल जीवन के निर्माण में नए विचार उत्पन्न करने में मदद करें।

युवावस्था नव निर्माण काल- पूर्व के दो आयुकाल में जो कुछ भी हम सीखते है उनका प्रभाव हमारे युवावस्था में पड़ता है। अब हम पूरी तरह से बाहरी दुनिया से जुड़ जाते है। और अपने परिवार पर निर्भरता को त्याग कर अपने जीवन के नए राह की ओर अकेले ही बढ़ते है। जिन विचारो का निर्माण हमने पूर्व में अपने मस्तिष्क में किया हुआ है उसी के आधार पर हम इस समाज, संस्कृति में अपना एक स्थान बनाते है।

यहाँ दो चीजें हमें आगे बढ्ने और समाज में अपने आप को स्थापित करने में बहुत ही मददगार साबित होती है। प्रथम परिवार द्वारा प्राप्त विचारों में इतना सामर्थ्य हो जिसके द्वारा हम किसी प्रकार की निर्भरता के समाज को अपना परिचय दे सके। और जिन विचारों का आज तक हमने निर्माण किया है उनकी सहायता से एक आदर्श और सम्पन्न खुशहाल जीवन जी सके। इसके पूर्व तक के समय में हम दूसरों के बताए रास्ते में हमे अच्छे बुरे का फर्क ढूँढना होता था। पर अब हम उस अवस्था में पहुँच चुके होते है जिसमे हमे अपने रास्ते खुद चुनने होते है। तथा सही गलत का निर्णय हमे अपने स्वविवेक से करना होता है।

निष्कर्ष

उपरोक्त वर्णित तीन ही चरण है जो हमारे सम्पूर्ण जीवन के व्यक्तित्व निर्माण के लिए महत्वपूर्ण होते है। वैसे तो बहुत सारे अन्य पड़ाव भी हमारे जीवन में आते रहते है लेकिन उपरोक्त चरण ही हमारे जीवन काल में आवश्यक होते है। और खास कर उपरोक्त आरंभिक दो पड़ाव का प्रभाव तो हामरे सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि परिवार अपने कर्तव्यों को समझते हुए बच्चे को अच्छे विचार और अच्छे व्यवहार हेतु प्रोत्साहित करे तो उसके जीवन में इसका बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। साथ ही साथ यदि एक बच्चा अपने मित्रों का चयन बहुत ही अच्छे ढंग से करे तथा उसके मित्र मंडली का संपर्क उसके परिवार के सदस्यों से भी हो।

तो जीवन के निर्माण में वह बहुत ही अच्छी अवस्था को ग्रहण करेगा। और समाज में सही व्यक्तित्व का निर्माण करते हुए एक सभ्य और खुशहाल जीवन की ओर अग्रसर होगा। अतः यदि हम बोले कि बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में सबसे ज्यादा योगदान पहले उसके परिवार, उसके बाद उसके मित्र और सहपाठियों और अंत में समाज का होता है। तो इसमे कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा।

!इति शुभम्!

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