हरि शयनी एकादशी – चतुर्मास महात्म्य और आराधना

सनातन धर्म समाज में एकादशी तिथि का बहुत ही महात्म्य है। इसे भगवान विष्णु की तिथि मानी जाती है। और इस दिन व्रत रखते हुए भगवान विष्णु की आराधना करने का बहुत ही लाभकारी माना गया है। हर मास में 2 एकादशी पड़ती है इस प्रकार से 24 एकादशी पूरे वर्ष मे आती है। और पौराणिक ग्रन्थों के हिसाब से इनका एक नाम और अलग अलग महात्म्य है। उन्ही में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को हरि शयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। मान्यता है इस दिन से भगवान विष्णु 4 मास के लिए शयन करते है। और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हरि प्रबोधिनी को पुनः जागृत होते है जिसे सामान्य भाषा में देव उथनी एकादशी के रूप में भी माना जाता है। इस बार हरिशयनी एकादशी 01 जुलाई 2020 को पड़ रही है।

हरि शयनी एकादशी महात्म्य

मान्यता है हरि शयनी से लेकर हरि प्रबोधिनी एकादशी तक के काल को चतुर्मास के रूम में माना जाता है। और यह चतुर्मास का समय पूरी तरह से ईश आराधना को समर्पित होता है। चार मास को बहुत सारी वर्जनाए भी होती साथ ही पूरे चतुर्मास काल को कई देव आरध्ना के लिए विभजित किया गया है। तो सम्पूर्ण रूप में इस आराधना काल में हम एक अलौकिक संतुष्टि की प्राप्ति कर सकते है। चलिये हम इसके बारे में विस्तार से जानते है।

निषेध और दिनचर्या-

चतुर्मास के बारे में मान्यता है कि इस चार मास के समय मे शादी विवाह जैसे मंगल कार्य पर रोक रहती है। हरि प्रबोधिनी एकादशी के उपरांत पुनः लौकिक मंगल कार्य शुरू किया जाता है। साथ ही साथ चौतर्मास को एक व्रत काल के रूप में अनुशरण करने की मान्यता है जिसमे कई निषेध है जिनमे जिनमे हमे जमीन पर सोने का व्रत करना चाहिए। सूर्योदय से पहले निद्रा का त्याग कर देना चाहिए। स्नान, ध्यान इत्यादि का पालन करना चाहिए और अधिकतम समय ईश आराधना मे व्यतीत करना चाहिए। इसके साथ कुछ और निषेध भोजन को लेकर है जिनमे गरिष्ठ भोजन, तामसिक भोजन का त्याग कर देना चाहिए व्रत के दिशा निर्देशों के अनुरूप कम भोजन ग्रहण करना चाहिए। साथ ही साथ श्रावण मास में पत्तेदार सब्जियों का, भाद्रपद में दही का, आश्विन में दूध एवं कार्तिक में दाल का निषेध रखना चाहिए। वैज्ञानिक रूप से भी देखे तो वर्षा काल में इन पदार्थों से हमारे पाचन क्रिया और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

चतुर्मास आराधन-

वैसे तो चतुर्मास काल भगवान विष्णु की आराधना काल माना गया है लेकिन इसके साथ ही इस चतुर्मास काल में कुछ और देवी देवताओं के लिए विशेष आराधना के लिए समय विभाजित है जो इस प्रकार से है।

श्रावण मास (शिव आराधना)-

प्रथम मास श्रावण मास में भगवान विष्णु के इष्ट आदि देव महादेव कि आराधना के लिए मान्यता है। पूरे श्रावण मास वर्षा काल माना जाता है। और शिव आराधना के लिए सबसे जरूरी अवयव जल का अर्पण है इसी लिए श्रावण मास का समय शिव आराधना के लिए समर्पित होना चाहिए। श्रावण मास के सोमवार को शिव के विशेष आराधना और व्रत का विशेष महत्व है। शिव की आराधना के लिए किसी विशेष व्यवस्था की आवश्यकता नहीं बल्कि सच्चे मन से केवल एक लोटा जल अर्पण करने मात्र से सच्ची श्रद्धा रखते हुए उनका पंचाक्षर मंत्र जाप मात्र से वो अपने भक्तों पर कृपा प्रदान करते है।

भाद्रपद मास (कृष्ण और गणपति आराधना)-

श्रावण मास के उपरांत भाद्रपद मास में श्री कृष्ण जन्माष्टमी और हल छठ के के दिन भगवान कृष्ण की व्रत और आराधना करने की मान्यता है। उत्तर भारतीय क्षेत्र में तो हल छठ के दिन पुत्र के लिए विशेष पूजन का भी मान्यता है। तथा जन्माष्टमी के दिन पूरे दिन व्रत और कृष्ण नाम जपते हुए रात्रि बजे श्री कृष्ण के जन्म का उल्लास मनाने की मान्यता है। इसके साथ ही भाद्रपद मास मे गणपती पूजन का विशेष महत्व है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी तिथि को गणपती के जन के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में और देश के कई अन्य राज्यों में तो इस उत्सव को दस दिनो के लिए विनायक चतुर्दशी तक मनाया जाता है। जिसमे लोग अपने सामर्थ्य अनुसार चतुर्थी के दिन गणेश की प्रतिमा की स्थापना करते है और दस दिनो के पूजन के उपरांत उनका चतुर्दशी के दिन विसर्जन करते है।

आश्विन मास (पितृ और भगवती आराधना)

आश्विन मास को दो भाग मे आराधना के लिए मान्यता है। जिसमे प्रथम पक्ष में गणेश चतुर्थी के उपरांत अगले दिन से पितृ पक्ष का आरंभ होता है। जिसमे सभी सनातन धर्म के व्यक्ति अपने घरों में स्नान ध्यान उपरांत अपने पूर्वजों को जल अर्पित करते है और किसी भी एक तिथि को उनकी शांति और उनके आशीर्वाद के लिए क्षमता अनुसार गरीबों और ब्राह्मण को भोजन प्रदान करते है और पितृ विसर्जन के दिन उनसे अपने कुल की खुशहाली की कामना करते हुए अगले वर्ष पुनः आने के विश्वास के साथ विदा करते है। इसके अगले ही दिन प्रथमा तिथि के दिन नव दिवसीय नवरात्रि पर्व की शुरुवात होती है जो की पूरी तरह से माँ दुर्गा, भगवती की आराधना को समर्पित है। और नव दिन के व्रत पूजन के साथ देवी से अपने और सर्वजन के खुशहली कि कामना करते है।

कार्तिक मास (कल्पवास और विष्णु आराधना)-

चतुर्मास का अंतिम मास कार्तिक मास है जिसकी बहुत ही ज्यादा मान्यता है। इस मास में कल्पवास के रूप में वैष्णव जन व्रत का पालन करते हुए किसी तीर्थ इत्यादि में वानप्रस्थ आश्रम का पालन करते है। जिसके अंतर्गत सूर्योदय पूर्व और सूर्यास्त के समय पवित्र नदी में स्नान एक वक्त ही भोजन ग्रहण करना भूमि पर सोना और पूरे समय भागवत आराधन मे समय व्यतीत किया जाता है। तुलसी पूजन का मास भी इसे माना जाता है। जिसमे घर कि औरते सुबह और शाम को तुलसी के वृक्ष के नीचे पूरे मास दीपक जला कर तुलसी की आराधना करती है। इस मास में आवला नवमी, देवोथनी एकादशी और कार्तिक पुर्णिमा के रूप में पुण्य काल का व्रत पूजन करके लाभ उठाते है।

निष्कर्ष-

चतुर्मास की मान्यता बहुत ही पौराणिक है। प्राचीन आध्यात्मिक ग्रंथो मे कई रूप मे इसके महात्म्य की व्याख्या है। ये चतुर्मास मे यदि इसके दिये नियमों का पालन करे तो वो हमे एक अलौकि ऊर्जा प्रदान करती है साथ ही साथ आध्यात्मिक शांति का अनुभव हमे प्राप्त होता है। इस व्यस्त जीवन मे आज इस चतुर्मास के नियमो का पालन करना बहुत कठिन महसूस होता है लेकिन अपने सामर्थ्य अनुसार यदि हम इसका पालन करे तो अवश्य हमे शारीरिक और मानसिक दोनों ही रूप में नवोत्थान का अनुभव होगा। सनातन धर्म में कोई भी नियन पूरी तरह बाध्य नहीं है हर किसी को उसकी क्षमता अनुसार ही उसका पालन करना है और पूर्ण लाभ प्राप्त किया जा सकता है। तो आइये इस चतुर्मास का लाभ अवश्य उठाए और भागदौड़ भरी दुनिया में थोड़ी आध्यात्मिक शांति का अनुभव करें।

||इति शुभम्य||

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