बुद्ध पुर्णिमा 2020 (Buddha Purnima): वर्तमान समय मे बुद्ध के बताए 12 भवचक्रों (दुःख समुदय) का महत्व

वैशाख मास की पुर्णिमा तिथि को बुद्ध पुर्णिमा (Buddha Purnima) के रूप मे भी जाना जाता है। आज ही के दिन महात्मा बुद्ध की जयंती के रूप मे मनाया जाता है। और आज ही के दिन महात्मा बुद्ध ने काशी के सारनाथ मे अपना प्रथम उपदेश भी दिया था।

महात्मा बुद्ध का जन्म कौशल प्रांत के कपिलवस्तु के लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता शाक्य गणतन्त्र के मुखिया शुद्धोदन थे इनकी माता का नाम महामाया था। इनके जन्म के कुछ समय उपरांत इनकी माता का देहांत हो गया। और इनका पालन पोषण इनकी अमाता गौतमी ने किया इसलिए इन्हे गौतम के नाम से जाना जाने लगा।

इनका मूल नाम सिद्धार्थ था। प्राचीन उत्तर भारतीय ग्रन्थों में महात्मा बुद्ध को भगवान विष्णु के 9 अवतार के रूप में भी जाना जाता है। सामी के साथ और लोगो के तर्क कुतर्क के कारण महात्मा बुद्ध के विचारों को सनातन धर्म से अलग कर लिया गया। और इस बौद्ध धर्म के रूप मे भी स्थापित कर दिया गया।

बाद मे बौद्ध धर्म भी दो शाखाओं (हीनयान और महायान) में विभाजित हो गया। लेकिन महात्मा बुद्ध के विचार सम्पूर्ण मानव समाज मे बहुत ही लाभकारी है। वैसे तो महात्मा बुद्ध के उपदेशो शिक्षाओं को एक लेख मे समा पाना असंभव है।

अतः आज मै इस लेख मे महात्मा बुद्ध द्वारा दिये गए 12 भवचक्रों के बारे मे बात करूंगा और बताने का प्रयास करूंगा कि आज के समय मे इनकी क्या प्रासंगिकता है। 

दुःख समुदाय-

महात्मा बुद्ध के बारे मे एक कथा बहुत ही प्रचलित है कि एक बार वो अपने अमात्य के साथ नगर भ्रमण पर मिलते है। और 4 चीजे (वृद्ध, रोगी, शव और वैरागी) देखकर वो उनके बारे मे अपने अमात्य से पुछते है और उनके बारे मे जानकारी मिलने के उपरांत ही उनके अंदर वैराग्य की भावना उत्पन्न होती है।

और वैराग्य धारण के उपरांत कई सालों की तप के कारण जो 4 आर्य सत्यों का प्रति पादन करते है। जो की इस प्रकार से है। 1. दुःख 2. दुःख समुदय 3. दुःख निरोध 4. दुःख निवारण के मार्ग ।

महात्मा बुद्ध का मानना था समस्त संतापों का कारण जीवन मरण का चक्र है। वैसे तो महात्मा बुद्ध अनात्मवादी तत्वमीमांसी ज्ञान के प्रचारक थे लेकिन फिर भी जीवन मरण के चक्र को मानते थे। और इसे एक प्रवाहशील कर्म मानते थे। आज हम इनके द्वितीय आर्य सत्य की व्याख्या करने का प्रयास करेंगे जिसे इन्होने दुःख समुदय (समुदाय) के रूप में प्रतिपादित किया।

महात्मा के अनुसार जीवन मरण के चक्र से बच कर ही हम सभी संतापों से मुक्त होकर निर्वाण की प्राप्ति कर सकते है। लेकिन हम तब तक इससे मुक्ति नहीं पा सकते जबतक हम इस दुःख के कालक्रम से मुक्त नहीं हो सकते।

ये दुःख क्रमानुसार हमारे जीवन से जुड़ा रहता है। ये एक समुदाय के रूप में संगठित रहता है और इसी के कारण हम जीवन मरण के जाल में उलझते जाते हैं। महात्मा बुद्ध के अनुसार ये कुल 12 प्रकार के होते है। 

1. जरा-मरण- 

जरा मरण का शाब्दिक अर्थ होता है बुढ़ापा (Old Age) और मृत्यु (Death) जीवन मरण की प्रथम और महत्वपूर्ण कड़ी और सभी दुःखो का प्रथम चरण होता है जरा और मरण व्यक्ति वृद्धावस्था से होकर मृत्यु की ओर बढ़ता है।

और अगले जन्म और अगले जन्म के काल क्रम मे फँसता रहता है। जरा मरण की अवस्था ही उसे सही माने में दुःखो से साक्षात्कार कराती है। इस अनुभव से पहले वो जीवन मे हर्ष और न्यूनतम विषाद से भयभीत नहीं होता है लेकिन जरा मरण की अवस्था ग्रहण करते ही उसे अपने दुःखो का अनुभव होने लगता है।

अब बात करेंगे आज के समय में इसकी प्रासंगिकता की तो हमे देखना होगा महात्मा बुद्ध ने हमेशा सर्वसमाज के हितो की बात की अहिंसा (Non-Violence) के जरिये समाज में करुणा और प्रेम की के प्रसार को प्रोत्साहित किया।

और जहां करुणा और प्रेम की बात आती है वहा जीवन का निस्वार्थ रूप देखने को मिलता है और इसी निस्वार्थ कर्म के द्वारा हम इस जरा मरण के दुःख को समाप्त करने की शक्ति प्राप्त कर सकते है। 

2. जाति- 

यहाँ जाति से तात्पर्य जन्म (Birth) से है। जीव जीवन मरण के जंजाल में फंसा रहता है और हमेशा दुःखो के जालक्रम मे अपने आपको पाता है। और इस कालक्रम का द्वितीय प्रमुख अवयव (Object) जन्म है या फिर इसे Rebirth के रूप मे भी मान सकते है।

मृत्यु के उपरांत जीव पुनः इस संसार मे दुःख के साथ जीवन यापन हेतु जन्म लेता है। और जब तक वो सम्यक दर्शन के अवयवों को नहीं धरण करता है। तब तक वो पुनः पुनः जन्म लेता रहता है। और इस दुःख समुदाय का हिस्सा बना रहता है।

आज के समय में भी देखा जाये तो हम पाएंगे हम कितने संसाधनो के पीछे जीवन पर्यंत भागते रहते है फिर भी असंतुष्टि का ही अनुभव करते है। और अंततः हम वृद्धावस्था उपरांत हम मृत्यु की सय्या पर लेट जाते है और सारी कामनाओं को अधूरा समझते हुए पुनः इस धरती पर जन्म लेते है। और इसी क्रम में जन्म जन्मांतर तक बंधे रहते है। 

3. भव-

भव से तात्पर्य पुनर्जन्म के कर्मों से है। जब भी हम जन्म लेते है तो हम पुनर्जन्म के कर्मों के अधीन ही जीवन यापन करते है। और हमारे आगे के कर्म भी उनही के आधार पर हम तय करते है।

और इसी भ्रम के कारण हम इस कालक्रम मे अपने आप को फाँसते जाते है। जन्म के उपरांत हमारी जीवन लीला भले ही पूर्व जन्मो के कर्मों के आधार पर निर्धारित हो फिर भी हमे अपने ऊपर नियंत्रण होना चाहिए।

और सोचना चाहिए अगर पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण हमे दुःख इस जीवन में देखने को मिलता है। तो आगे का जीवन हमे उस आदर्श रूप में व्यतीतकरना चाहिए जेससे इस जनम मरण के भवजाल से मुक्त हो सके। 

4. अपादान-

अपादान का शाब्दिक अर्थ आसक्ति से है। जब हम इस जीवन के भवजाल में फंसे रहते है। तो हमे बहुत सारी चीजों से आसक्ति हो जाती है। सामान्य शब्दों मे कहे तो संसार की बहुत सारे अवयवो से Attraction जुड़ाव हो जाता है वो फिर किसी विषय वस्तु किसी जीव इत्यादि किसी से भी हो सकता है।

ये किसी न किसी रूप में हमे दुःख रूपी परिणाम की ओर जाती है। आसक्ति से दुःख मिलने का सबसे प्रमुख कारण ये है कि हमे आसक्ति उनही चीजों से होती है। जिन्हे हम किसी न किसी रूप में पसंद (Like) करते है।

और जिन्हे हम पसंद करते या फिर जिनके प्रति हमे आसक्ति है। उनके खोने बिछड़ने का भय (Fear) हमे हमेशा बना रहता है। और यही भाय हमे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप में दुःख रूप अंतहीन कूप में हमे धकेल देते है। 

5. तृष्णा-

एक साधारण मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन मे तृष्णा हमेशा विद्यमान रहती है। तृष्णा का शाब्दिक अर्थ है विषयों के पाने की तीव्र इच्छा। हम अपने सम्पूर्ण जीवन में सुख संसाधनों के पीछे पीछे भागते रहते है।

ये सुख संसाधन ये भोग विलास के विषय के प्रति हमारी भूख ही तृष्णा के रूप मे जानी जाती है। जब तक हम इन विषयों को पा नहीं लेते तब तक हमे इन्हे पाने की लालशा बनी रहती है। और जब हम विषयों को प्राप्त कर लेते है तो इनके समाप्त, खोने और नष्ट होने का भय रहता है।

और यही लालशा और भय कही न कही हमारे मन चित्त मे दुःख के रूप मे व्याप्त रहती है और हमे जन्म मरण के जाल में बांध कर रखती है। 

6. वेदना- 

वेदना से तात्पर्य उन अनुभवों से है जो हमे इंद्रियों द्वारा प्राप्त होती है। बुद्ध के अनुसार इंद्रियों द्वारा प्राप्त सभी अनुभव जिन्हे हम सुख और दुख के रूप मे देखते है वो सभी रूपों मे केवल और केवल दुख ही होते है।

इसीलिए लिए उन्हे विदना के रूप में परिभाषित करना ही उचित होगा। हम जिस इंद्रिय अनुभव को सुख के रूप में देखते है असल में वो सुख नहीं होता है क्योंकि सुख क्षणिक नहीं हो सकता। वो तो शाश्वत होता है।

उसे नष्ट नहीं किया जा सकता अतः ये हमारा भ्रम है कि हम इंद्रिय अनुभव को वेदना के रूप में न मानकर उसे सुख और दुख के रूप मे विभाजित करते है। और जीवन मरण के काल क्रम मे फंसे रहते हैं। 

7. स्पर्श-

सातवाँ समुदय वेदना का ही विस्तारित रूप है। जब हम इंद्रिय अनुभव को लाभ के रूप में देखते है तो हम उन्हे पाने की लालशा रखते है। और इसे पाने के लिए हम विभिन्न विषयों को पाने का प्रयास करते है और इन विषयों को जब हम अपनी इंद्रियों से संपर्क कराते है तो उसे हम स्पर्श के रूप में जानते है।

हमारी सबसे बड़ी भूल ये होती है कि हम इन विषयों के इंद्रियों के संपर्क में आने के पूरी प्रक्रिया में किसी आनंद का अनुभव करते है। लेकिन जैसा की ज्ञात है आनंद अथवा सुख कभी क्षणभंगुर नहीं हो सकता है। उसे हम कभी भी सुख के रूप में या फिर आनंद के रूप में नहीं मान सकते जो कि शाश्वत न हो।

8. षडायन-

महात्मा बुद्ध ने जीव के शरीर को 6 अवयव बताए है जो प्रायः सभी भारतीय दर्शन की शाखाओं ने बताया है। इन्हे ही षडायन के रूप में जाना जाता है। ये 6 अवयव मन और 5 इंद्रियाँ है। हमारे शरीर की समस्त प्रक्रिया इन्ही के द्वारा संचालित होती है।

इनकी के द्वारा हमारे मन मे भावनाए जागृत होती है। इन्ही के द्वारा हमे सुख और दुख का काल्पनिक अनुभव होता है। यही है जिनके कारण हमारे मानस मे आसक्ति, और विरोध का अनुभव होता है।

यही शरीर के 6 अवयव है जो हमे इस दुःख भरे संसार से जोड़े रखने का कार्य करते है। और इन्ही के कारण हम जन्म जन्मांतर तक जन्म मरण के जाल में फंसे रहते है। 

9. नामरूप- 

नामरूप से तात्पर्य उन सभी विषयों से है जो हमे दृश्यमान है। इस जगत की समस्त विषयवस्तु यहा तक की हमारा शरीर ये समस्त अवयव नामरूप के द्वारा परिभाषित किए जा सकते है। और यही सबसे प्रमुख कारण है कि इन्हे हम पूर्ण सत्य मानकर इससे जुड़ाव बनाए रह जाते है।

और इनसे विरक्ति न करके हम दुःख भरे संसार मे फंस कर रह जाते है। इसको औरअच्छे से देखा जाये तो शंकराचार्य द्वारा बोला गया वाक्य ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या उपरोक्त बिन्दु को ज्यादा व्याख्यायित कर सकता है।

यानि हम इस अर्ध सत्य जगत और इसके अवयव को सही सम्पूर्ण सत्य मान लेते है और निर्वाण के मार्ग से विमुक्त हो जाते है। 

10. विज्ञान-

यहाँ विज्ञान से तात्पर्य चेतना से है। चेतना हमारे मन मे उठे तर्क और संवाद से संबन्धित है। ये हमे उतना ही सत्य बताने का प्रयश करती है जितना इसने अनुभव किया हाओता है। और हम न तो इस चेतना को जागृत करने का प्रयास करते है और न ही इसे निर्णय लेने हेतु रोकते है।

ये अर्धजागृत चेतना ही हमे सही ज्ञान नहीं प्रदान करती है और कुतर्कों का अनुसरण करते हुए हम इस संसार की सही व्याख्या को समझ नहीं पाते है। और जन्म मरण के मकडजाल जाल मे उलझते ही जाते है। 

11. संस्कार-

ग्यारहवा समुदय है संस्कार। संस्कार से तात्पर्य पूर्वजन्म के कर्मों और अनुभव से उत्पन्न वासनमय विषय। सामान्य शब्दों मे कहे तो महात्मा बुद्ध के शब्दों में जीवन मरण न टूटने वाली एक प्रवाहमय धारा है।

अतः पूर्वजन्म के कर्म और उसके अनुभव किसी न किसी रूप में हममे विद्यमान रहती है। और हमारे सभी निर्णयों में हम उसकी सहायता अवश्य लेते है। चूंकि उन अनुभवों और कर्मों के आधार पर जो परिणाम होता है उसे उचित समझते है और इसी कारण से हम इस दुःख रूपी जीवन के बोझ को जीवन पर्यंत ढ़ोते रहते है। 

12. अविद्या- 

सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम समुदय है अविद्या। अविद्या की व्याख्या बहुत ही विस्तारित रूप में है हमारे मनस मे जब तक अविद्या विद्यमान रहेगी हम उपरोक्त सभी समुदय को न तो अनुभव करेंगे और न ही इसे हानी रूप में देखेंगे और जीवन पर्यंत दुःखो के अन्य कारणों की तलाश में भटकते रहेंगे।

जब मध्यमा मार्ग के द्वारा सम्यक दर्शन का हम अनुशरण करेंगे तभी हमे इस अविद्या से नुकती मिलेगी। अविद्या ही इन सभी का मूल सार है। अविद्या के कारण ही हम दुःखो के मूल को अनुभव तो करते है लेकिन इसके कारणो को नहीं समझ पाते है। और जीवन पर्यंत जीवन मरण रूपी दुःख से घिरे रहते है। 

निष्कर्ष

अंत मे हम यही कह सकते है महात्मा बुद्ध ने न तो समस्त संसार की त्याग की बात की है और न ही इसमे पूरी तरह लिप्त हो जाने की बात की है महात्मा बुद्ध हमेशा मध्यमा मार्ग की बात करते है।

मध्यमा मार्ग का अनुशरण करते हुए हम करुणा, प्रेम, सेवा की निस्वार्थ भावना के साथ जीवन मे दुःखो से बच सकते है। साथ ही साथ इन्ही अवयवो और सम्पूर्ण जगत के कल्याण की भावना के साथ इन दुःखो से हमेशा हमेशा के लिए मुक्ति भी प्राप्त कर सकते है।

अतः इनकी शिक्षा का सार यही देखना चाहिए की वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के साथ अपने स्वार्थो, विषयासक्ति से मुक्त हो समस्त संसार मे प्रेम, करुणा और सेवा को जीवन सार बना कर जीवन यापन करना चाहिए। 

||इति शुभम्य||

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