रामायण में भाइयों के चरित्र का दार्शनिक समालोचना

भारतीय सनातनी परिवार में हर Member (चाहे वो Literate हो या Illiterate ) रामायण और महाभारत की कथा को अवश्य जानता है चाहे विस्तार रूप में या फिर सामान्य रूप में। लेकिन इन दो कथाओं से कोई अपरिचित नहीं है। रामायण और महाभारत हर दिन कोई न कोई नई सीख देते है। आज हम उनही मे से एक, रामायण कथा में भाइयों के चरित्र के बारे में जानने का प्रयास करेंगे।

1. लक्ष्मण-

लक्ष्मण जैसे भाई का उदाहरण हर कोई देता है। कभी कभी तो लगता है लक्ष्मण जैसा भाई का चरित्र तो केवल कल्पना मात्र हो सकती है। कैसे कोई भाई अपने बड़े भाई की सेवा हेतु समस्त सुख साधनों की भी चिंता नहीं करता। लक्ष्मण को यदि राम की परछाईं कहा जाये तो ये अतिशयोक्ति नहीं होगा। मान्यता है की राम के वनवास जाने पर लक्ष्मण ने अपनी पत्नी उर्मिला को अयोध्या मे छोडकर उनके साथ वन गमन करते है और उर्मिला को भी उनकी याद में अश्रु ना बहाने का वचन लेकर जाते है। अपने भाई की सेवा हेतु लक्ष्मण राजमहल की समस्त सुविधाओं का त्याग कर देते है।
मान्यता तो ये भी है कि सम्पूर्ण 14 वर्ष के समय काल में लक्ष्मण ने कभी शयन नहीं किया राम की सेवा के लिए हर क्षण जागते रहे। अपना समस्त जीवन राम की सेवा मे समर्पित कर दिया। अब बात करे दार्शनिक समालोचना की तो देखेंगे सही मायने में तो वर्तमान में ऐसे भाई ढूँढने पर भी नहीं मिलेंगे। जिनके सर्वस्य जीवन का एक मात्र लक्ष्य भाई की सेवा मात्र है।

2. भरत-

अब बात करें भरत की तो स्वयं राम के शब्दों में बाई हो तो भरत जैसा जिसे समस्त राज पाट मिल जाता है। वो उसका त्याग कर देते है। और वन जाकर अपने भाई को वापस आकर राज्य संभालने के लिए अनुरोध करते है चूंकि प्रभु श्रीराम अपने वचनो से बंधे हुए है। और वापस अयोध्या आने से माना कर देते है। जिसपर भरत उनके चरण पादुका को राजसिंहासन पर आसीन करके राज्य का संचालन शत्रुघन को सौप देते है। और स्वयं अयोध्या के सीमा पर स्थित नंदीग्राम में स्थित छोटी सी गुफा में प्रभु श्री राम के ध्यान में लग जाते है।
भरत जैसा भाई के चरित्र की विवेचना करना बहुत ही कठिन है आज के परिवेश में इसकी कल्पना करना भी गलत होगा कोई भाई जिसे बिन मांगे सब कुछ मिल जाता है। और वो उस राज पाट का त्याग कर ताप में लग जाता है। यहा तक की भरत ने प्रण किया था यदि 14 वर्ष पूर्ण होने के बाद एक दिन भी देर हुई राम के आगमन में तो वो अपने प्राणों का त्याग कर देंगे। आज भी राम भरत मिलाप का कार्यक्रम इसी उपलक्ष्य में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। जिसमे 14 वर्ष के वनवास पूर्ति उपरांत श्री राम सबसे पहले भरत से मिलते है।

3. कुंभकरण-

रामायण में कुंभकरण के चरित्र को भी एक भाई की भूमिका में समझना अति आवश्यक है। कुंभकरण जो कि नीति अनीति में अंतर करना जानता था लेकिन फिर भी उसने अपने भाई का साथ दिया जो कि नैतिक रूप से उचित नहीं माना जाएगा लेकिन व्यक्तिगत रूप से एक भाई केनाते छोटे भाई का कर्तव्य बड़ी ही अच्छे से निभाया उसने रावण को एक बार को सीता को वापस करने के लिए भी समझाया और सीता के अपहरण को अनुचित माना लेकिन अपने भाई के न मानने के उपरांत उसने अपने भाई का साथ दिया और भ्रातृ धर्म का पालन किया। उसे पूरी तरह से मालूम था कि राम से युद्ध में उसका सर्वस्व नाश हो जाएगा लेकिन फिर भी उसने भाई का साथ नहीं छोड़ा।

4. विभीषण-

बात अगर आए विभीषण का तो आज के समाज में उसे गलत माना जाता है लेकिन कहीं न कहीं हम यदि उसके चरित्र की विवेचना करे तो पाएंगे उसने कभी भी अपने भाई का अहित नहीं सोचा उसने हमेशा धर्म के मार्ग का पालन किया और रावण को भी हर बार धर्म के मार्ग पर चलने को बोलता रहा। स्वयं रावण ने ही उसे लात मार कर भगाया। राम के पास जाने के उपरांत भी विभीषण हमेशा चाहता रहा कि रावण धर्म के मार्ग को ग्रहण करे। राम के द्वारा विभीषण का राज्याभिषेक करने के उपरांत भी विभीषण के मन कभी भी राज पाट पाने की इच्छा नहीं रही बल्कि वो यही चाहता रहा कि रावण सीता को वापस राम को सौंप दे और धर्म के मार्ग पर चलता रहे। परंतु होनी को कोई नहीं टाल सकता था। और आज विभीषण के चरित्र को गलत रूप में ही देखा जाता है।

5. राम-

वैसे तो राम को चरित्र को केवल भाई के रूप में व्याख्यायित करना उचित नहीं रहेगा और राम के सम्पूर्ण जीवन में आलोचना का कोई स्थान भी नहीं है। तभी तो इन्हे मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। लेकिन लेख की आवश्यकता के अनुरूप यहा पर हम राम के रूप में भाई के चरित्र की बात करेंगे। राम के चरित्र को भाई के रूप में देखने के बजाय हम कह सकते है कि स्वयं राम का जीवन भाई शब्द की सम्पूर्ण परिभाषा प्रस्तुत करते है। राम ने अपने भाई अपने भरत को राज पाट देने की बात पर पूरी प्रसन्नता के साथ अपना लिया। लक्ष्मण के मूर्छित होने पर उन्होने एक बड़े भाई के रूप में पिता के जैसा ज़िम्मेदारी निभाई। उन्होने सभी प्रकार की ज़िम्मेदारी पूरी प्रसन्नता के साथ मन में बिना किसी छल कपात के साथ निभाई। और राम के चरित्र को भाई के रूप मे ही सीमित कर देना उचित नहीं होगा। तभी तो इन्हे मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है।

निष्कर्ष-

उपरोक्त लेख को संपूर्णता मे अगर समझने का प्रयास किया जाये तो हम पाएंगे तो हमने रामायण के 5 भाइयों के चरित्र का वर्णन किया है। और सभी भाई अपने अपने कर्तव्यों के पालन में कही न कहीं उचित मार्ग का अनुशरण किया है। भरत ने भ्रातृ प्रेम का ऐसा उदाहरण दिया जिन्होने राज पाट को त्याग कर अपने भाई के इंतज़ार मे वैरागी जीवन का अनुशरण किया। लक्ष्मण ने भाई की सेवा हेतु सम्पूर्ण जीवन को ही समर्पित कर दिया राम से अलग अपने जीवन की कल्पना भी नहीं की। कुंभकरण ने केवल और केवल भाई का साथ दिया उचित और अनुचित को जानते हुए भी उसकी परवाह नहीं की जिससे उसका नाश अवश्य है। विभीषण जैसा भाई जो कितनी ही बार अपमानित हुआ फिर भी अपने भाई को सही मार्ग और धर्म के मार्ग पर लाने के लिए तत्पर रहा। और अंत में बात की जाए राम कि तो क्या कहा जाये एक वक्ती में इतनी संपूर्णता नहीं हो सकती जिन्होने सभी की खुशियों की परवाह की कभी अपने हित की परवाह नहीं की और बिना किसी छल कपट खुशी खुशी अपने भाई के हित के बारे मे ही अग्रसर रहे।
इस लेख के द्वारा हम ये बताने का प्रयास कर रहे है कि आज के समाज में कोई भी रिश्ता अपनी पूर्णता खोटा जा रहा है। और रिश्ते केवल शब्द मात्र रह गए है। भाई भाई के मध्य बैर और दुर्भावना बढ़ती जा रही है। तो कहीं न कहीं उन्हे रामायण से ये सीख मिल सकती है कि किस प्रकार भाई भाई के मध्य प्रेम, सेवा, सद्भाव की भावना होनी चाहिए और भाई के हित की बात करना उसका कर्तव्य होना चाहिए।

||इति शुभम्य||

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