भीष्म पितामह के पाप जिसके कारण बाणों की शैय्या पर लेटना पड़ा

महाभारत और रामायण दो ऐसी पौराणिक कथा संग्रह है जिसके द्वारा हम जीवन के समस्त अवयवो का ज्ञान प्राप्त कर सकते है। जितना ज्ञान हमे केवल इन दो पुस्तकों से प्राप्त हो सकता है उतना ज्ञान हमे जीवन भर अध्ययन करने से भी नहीं मिल सकता है।

आज हम महाकाव्य महाभारत मे वर्णित एक ऐसी कथा का वर्णन करेंगे जिसके द्वारा हम जानेंगे कि बाल ब्रह्मचारी और दृढ़ प्रत्यज्ञी होने के उपरांत भी भीष्म पितामह को अपने कर्मो का फल भोगना ही पड़ा। इतने बड़े ज्ञानी और धनुर्धर होने के बाद भी अपने पूर्व जीवन मे किए पापों का फल उन्हे ग्रहण ही करना पड़ा।

महाभारत की मूल कथा से हम हर कोई वाकिफ है। और भीष्म पुतामह के चरित्र से भी हम सब बखूबी वाकिफ है। महाराज शांतनु और माता गंगा के एकलौते पुत्र भीष्म पितामह जिन्होने अपने पिता के प्रेम की पूर्ति करने हेतु अपने लिए आजीवन ब्रह्मचर्य ग्रहण कर लिया।

जो स्वयं भगवान विष्णु के अवतार भगवान परशुराम के शिष्य के रूप मे जाने जाते है। जिन्हे स्वयं अपने पिता से इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। वो भीष्म पितामह कई दिनों तक बाणों की शैय्या पर अपने अंतिम समय का इंतज़ार करते रहे।

आज इसी बाणों की शैय्या के भोग की बात हम करेंगे कि आखिर वो कौन से पाप थे जिनके कारण भीष्म पितामह को इसका फल भोगना पड़ा।

बात है महाभारत युद्ध की जब हर कोई जनता था की भीष्म पितामह को इस युद्ध मे पराजित कर पाना नामुमकिन था। लेकिन स्वयं भीष्म पितामह ने कहा था कि किसी स्त्री के सामने वो अपना अश्त्र नहीं उठा सकते है।

और इसी का फायदा उठाते हुए पांडवों ने युद्ध भूमि मे भीष्म पितामह के सम्मुख शिखंडी को खड़ा कर दिया और जिसके कारण भीष्म पितामह ने अपने अश्त्र रख दिये और अर्जुन ने उसी समय श्री कृष्ण के आदेशानुसार भीष्म पितामह को बाणों से छलनी कर दिया।

लेकिन इच्छा मृत्यु के वरदान के कारण भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायन होने तक अपने शरीर को त्यागने से मना कर दिया और कई दिनों तक उन्ही बाणों की शैय्या पर उन्हे अपना अंतिम समय बिताना पड़ा और अपार कष्ट झेलना पड़ा।

लोग समय समय पर उनसे मिलने आते थे उनसे ज्ञान की बाते करते थे। महाभारत मे ऐसे कई प्रसंग मिलेंगे जिनमे बहुत सारी ज्ञान की बातें भीष्म पितामह ने लोगो को बाणों की शैय्या पर रहकर ही दी है।

लेकिन कहीं न कहीं भीष्म पितामह के मन मे ये बात हमेशा रहती थी की इतना ज्ञानी होने के बाद भी मुझे अपने  10 जन्मों के भी बारे मे जानकारी है लेकिन आखिर मै क्यों नहीं जान पा रहा हूँ कि इतना कष्ट मुझे किन पापों के फल के रूप मे प्राप्त हुआ है।

उनके मन मे ये प्रश्न बार बार उठता था और इसका जवाब केवल एक ही व्यक्ति उन्हे दे सकते थे और उन्होने उनसे यानि की भगवान कृष्ण के सामने अपने मन की संका प्रस्तुत ही कर दी।

इसपर श्री कृष्ण ने बोला हे गंगा पुत्र भले ही तुम्हें अपने 10 जन्मो का ज्ञान हो लेकिन मै तुम्हारे सम्पूर्ण जन्मो का लेखा जोखा जानता हूँ। और ये जिन पापों का प्रायश्चित तुम आज इन बाणों की शैय्या पर लेट कर कर रहे हो ये  10 जन्मो से पूर्व के पाप है।

बात  तब की है जब तुम एक राजकुमार हुआ करते थे और आखेट मे तुम्हारी बहुत ही ज्यादा रुचि थी। और एक दिन तुम अपने मित्रों के साथ आखेट के लिए वन मे जाते हो रास्ते मे तुम्हें एक सर्प दिखाई देता है।

उस सर्प को मार्ग मे देखकर तुम अपना रथ रोक देते हो और रथ को आगे बढ़ाने के लिए उस सर्प को अपने बाणों से उठाकर मार्ग से इतर फेंक देते हो अज्ञानता वश ही तुम से एक पाप हो जाता है।

वो सर्प एक काँटेदार पौधे मे जाकर फंस जाता है। और जब तक उस सर्प की मृत्यु नहीं होती है वो उन्ही काँटों मे फँसकर ईश्वर से यही प्रार्थना करता है कि जिस प्रकार से कष्ट मैंने झेले है उसी प्रकार का कष्ट उसे भी मिले जिसने मेरे साथ ये सब किया है।

आज उसी कर्म का फल तुम्हें इन बाणों की शैय्या पर लेट कर भुगतना पड रहा है। और भले ही तुमने अज्ञानता वश ये पाप किया था लेकिन उस सर्प को मार्ग से हटाते हुए तुम्हें उसके हितों का भी ध्यान देना था और उसे मार्ग से दूर एक निश्चित और सुलभ स्थान पर रखना चाहिए था।

सार-

भारतीय सनातन धर्म मे पाप, पुण्य, कर्म और कर्मफल का महत्व बहुत ही अधिक है आज जो कुछ भी हम करते है उसका फल हमे अवश्य मिलता है। जन्म और पुनर्जन्म का सिद्धान्त इसी कर्मफल के सिद्धान्त से जुड़ा हुआ है।

नैतिक और अनैतिक कर्मों के आधार पर ही हमारे आने वाले समय का निर्धारण होता है। भले ही हम कितने भी समृद्ध शाली हो भले ही हमारे पास कई संसाधन उपलब्ध हो लेकिन अपने कर्मो का फल हमे भुगतना ही पड़ता है। हमारे आज और आने वाले कल का निर्धारण इसी के आधार पर होता है।

जीवन मे बहुत सारी आपाधापी हमे देखने को मिलती है लेकिन इसके उपरांत भी अपने कर्म के प्रति सतर्क रहना हमारा कर्तव्य होता है जिस प्रकार हमारे इन्ही कर्मो के कारण हम जन्म मृत्यु के बंधन मे बंधे रहते है उसी प्रकार से यही कर्म फल हमे ईश्वर प्राप्ति के लिए एक अन्य अवसर भी प्रदान करते है।

जब हम जन्म लेते है या फिर जब हम गर्भ मे रहते है तब हम उस ईश्वर से यही प्रार्थना करते है की इस पुनर्जन्म के बंधन से इस बार हमे मुक्त करे इस बार जन्म लेने के उपरांत हम अच्छे कर्म करेंगे लेकिन जन्म लेने के उपरांत हम उन बातों को भूल जाते है। जो माया के कारण होता है।

लेकिन ये महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथ हमे हमारे कर्तव्यों का याद दिलाने का काम करते है। अतः हमे अपने जीवन मे नीति का पालन करते हुए अपने कर्मों का निर्धारण करना चाहिए और उसी के आधार पर अपने जीवन का निर्वाह करना चाहिए।

ईश्वर की भक्ति और आराधना के जरिये हमे वो शक्ति भी प्राप्त करनी चाहिए जो आने वाले समय मे मिलने वाले कष्टों से हमारी रक्षा करती है। हमे हमेशा दूसरों के हिट और अहित का ध्यान रखते हुए ही जीवन का निर्वाह करना चाहिए।

||इति शुभम्य||

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