भारतीय सभ्यता का एक युग जो कहीं खोता जा रहा है

भारतीय सभ्यता का एक युग जो कहीं खोता जा रहा है

आज बहुत दिनों बाद पुराने दिनों की याद आ गई 90 की दशक की पैदाइश हूँ। जन्म भी एक छोटे से शहर मे हुआ था। 90 के दशक के बच्चे तो अब बच्चे नहीं रहे लेकिन ये लोग सबसे ज्यादा बदलाव देखने वाले लोगो मे आते है।

यही लोग है जिन्होने एक धीमी गति से शांत रूप से चलती जिंदगी से एक भाग दौड़ वाली जिंदगी देखी है। हमने 2 घंटे के दूरदर्शन के सिरियल को देखने के लिए एंटीना घूमते हुए आनंद का अनुभव किया है और आज OTT प्लैटफ़ार्म पर हजारों वेब सीरीज तक का सफर तय किया है।

लेकिन हम बात इन बदलाओं की नहीं करेंगे बल्कि हम बात करेंगे उन सभी पीढ़ियों की जो अपने जीवन शैली मे बहुत ज्यादा बदलाव देख रहे है। हम बात करेंगे उन बदलाओं की जो हमारी पूरी भारतीय सभ्यता को ही परिवर्तित कर रहे है।

बुजुर्ग-

भारतीय सभ्यता हो या फिर कोई अन्य सभ्यता हर जगह बुजुर्गों वृद्धों को बहुत ही सम्मान की नजर से देखा जाता है। वो हमरे मार्गदर्शक के रूप मे कार्य करते है। वो हमारे हर सुख दुख मे अपने अनुभवों के द्वारा हमे दिशा प्रदान करते है।

लेकिन बात करे समय के साथ क्या बदलाव देखने को मिले तो सबसे पहले बात आएगी Nuclear Family जहां अब बुजुर्ग नहीं रहते है। वो किसी पुश्तैनी मकान मे अपने बच्चों से बात करने को तरसते है। एक समय था जहां बुजुर्गो के बगैर घर के बारे मे सोच भी नहीं सकते थे आज वो देखने को नहीं मिलता है।

पहले बच्चे गर्मी की छुट्टियों मे अपने नाना नानी के घर जाया करते थे अब वो दादा दादी के पास जाते है वो भी अब खत्म हो रहा है क्योंकि अब छुट्टियों मे भी वो किसी ऐसे जगह पर जाना चाहते है जहां कुछ नया हो।

बुजुर्गों से हमे बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है लेकिन उनके साथ न रहकर हम उससे वंचित हो रहे है। जो सूर्योदय से पहले उठते थे घर द्वार की साफ सफाई का ध्यान रखते थे। पुजा पाठ, प्राचीन तीज त्योहार, महत्वपूर्ण तिथियों इत्यादि का याद दिलाते थे।

बच्चों को कहानियाँ सुनाना जिससे उनका मानसिक विकास हो सके ये सब धीरे धीरे इस भाग दौड़ भरी जिंदगी मे कहीं विलुप्त होती जा रही है। और शायद आने वाले समय मे हम इससे वंचित रहे।

युवा-

अबा बात करें युवा की। युवा से तात्पर्य उस वर्ग से है जो अपनी जीविकोपार्जन के लिए संघर्षरत है जो माता पिता तो बन चुके है लेकिन अभी भी उन्हे अपने बुजुर्गो का सानिध्य प्राप्त है। इस वर्ग मे तो इस बदलाव ने बहुत बेचैनी उत्पन्न कर दी है।

इनकी जीवनशैली तो मशीनी जीवनशैली हो रखी है। घर से दूर रहने के कारण न तो बड़ों का सानिध्य प्राप्त हो रखा है। और न ही बच्चों की परवरिश मे सही मार्ग पा रहे है। भाग दौड़ की इस मकड़जाल मे फंसे हुए है।

अपने और अपने बच्चों की आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के चक्कर मे सम्पूर्ण जीवन को खपाते चले जा रहे है। बस एक ही उद्द्येश्य जीवन मे दिखता है वो है समाज की इस दौड़ मे कैसे अपना स्थान सुनिश्चित कर सके।

बच्चे-

सबसे ज्यादा बदलाव देखने को मिल रहा है तो हमारे समाज के बच्चों मे और इसी बदलाव के कारण सम्पूर्ण सभ्यता मे बदलाव पूर्णरूपेण व्याप्त हो जाएगा। इन्हे न तो बुजुर्गों का सानिध्य प्राप्त है और नही इनके माता पिता के जरिये अपने प्राचीन परंपरा की कोई जानकारी प्राप्त हो रही है।

पैदा होने से लेकर ही इन्हे इस रेस का हिस्सा बना दिया जाता है। और जीवन के नैतिक स्वरूप से विरक्त कर दिया जाता है। इनकी जीवन शैली बहुत ही ज्यादा बदल चुकी है एक एक गाँव से एक मुहल्ला और अब एक घर तक के लिए इन्हे सीमित कर दिया गया है।

स्कूल का भी उद्द्येश्य अब सम्पूर्ण विकास नहीं रहा वहाँ भी इन्हे इसी दौड़ की महत्ता के बारे मे बताया जाता है। गुरु शिष्य की परंपरा अब केवल एक व्यवसाय का स्वरूप बन के रह चुका है।

रिश्तेदार, पड़ोसी-

कहने को तो अब भी हमारे आस पास बहुत सारे पड़ोसी है। कई सारे रिश्तेदार हमसे Whatsapp Group के जरिये जुड़े हुए है उनसे हम विडियो कॉल भी करते है। रोज Good Morning के मैसेज भेजते है लेकिन सही रूप मे हम इन सब से कहीं न कहीं कट चुके है।

पहले की तरह समय समय पर एक दूसरे के यहाँ जाना बगैर अनुमति के उनके घर पहुँच जाना अब ये सब संभव नहीं है। पड़ोसी की बात करें तो उन्हे हम बस Mr. फलाने और Mrs. फलाने के रूप मे औपचारिक रूप से ही जानते है।

थोड़ा बहुत लाज बचा रखा है तो उन गृहणियों ने जो दिन भर के अपने काम धंधे को खत्म कर कुछ समय उनके साथ बिताते है। लेकिन न तो हमारे बच्चे अब उनसे एक परिवार की तरह व्यवहार रखते है और न ही हम ही।

जरूरुत पड़ने पर हम उन्हे याद करते है। कोई पार्टी हो या बड़ा त्योहार हो तो बस उपहारों के आदान प्रदान तक ही उनका रिश्ता सीमित होता है। किसी के भी सुख दुख से कोई लेना देना नहीं है।

तीज त्योहार-

वैसे तो आज भी हम दीपावली, होली जैसे त्योहार बड़े धूम धाम से मानते है। लेकिन कुछ ऐसे भी तीज त्योहार होते है। जिनहे हम भूलते जा रहे है जिनका काम ही यही होता था कि उसी के बहाने हम सब एक साथ मिले जुले बात चीत करें।

जैसे नई फसल के कटाई पर हम अच्छे पकवान बनाकर एक दूसरे से बांटते थे उनसे मिलते जुलते थे। घर मे होने वाले सत्यनारायन की कथा हो या फिर किसी भी उपलक्ष्य मे होने वाले अखंड रामचरित मानस का पाठ हो इनके जरिये हम समय समय से लोगो से मिलते जुलते थे।

पहले हम पुजा पाठ का आयोजन अपनी खुशियों का विस्तार करने के लिए करते थे अब केवल उन्हे Rituals के रूप मे मानते है। ग्रहों की शांति और किसी उद्द्येश्य की पूर्ति तक के लिए ही हमारी पुजा पाठ सीमित हो चुकी है। अधिक मास का महात्म्य, पितृ पक्ष का महात्म्य, कार्तिक मास मे पूरे महीने तुलसी पूजन और दीप दान हम भूलते जा रहे है।

दिनचर्या-

अगर देखा जाये तो प्राचीन समय की दिनचर्या से आज का हमारा दिनचर्या बहुत ही बदलाव दिखा रहा है और इसे प्राचीन समय भी नहीं कह सकते क्योंकि अभी भी वो लोग इस समाज मे है जो इस दिनचर्या का पालन करते है या फिर इसे देखा है।

जैसे सूर्योदय से पहले उठना अपने से बड़ों को प्रणाम करना, रंगोली का निर्माण करना, घर मे सुबह सुबह भक्ति भजन का माहौल होना, सभी घर के लोग एक साथ मिलकर जमीन पर बैठकर भोजन करते थे। बच्चों मे बड़ों के प्रति जो डर होता था वो एक सम्मान का प्रतीक होता था।

यहाँ तक की मुहल्ले गाँव के सभी बड़ों के सामने बच्चे कुछ गलत करने से बचते थे। सुबह जल्दी उठना रात मे जल्दी सोना, पर्व त्योहार पर दिखावे से ज्यादा एक दूसरे के साथ मिलकर उसका आयोजन करना, ये सब कुछ कहीं विलुप्त होती जा रही है।

निष्कर्ष

परिवर्तन प्रकृति का नियम है लेकिन परिवर्तन के बजाय किसी सभ्यता का ही विलुप्त हो जाना कहीं न कहीं कष्टकारी है। समाज मे पहले भी प्रतिस्पर्धा होती थी आज भी है लेकिन सामाजिक और व्यावसायिक जीवन को अलग अलग रूप मे देखा जाता था।

आज की तरह केवल एक को महत्व नहीं दिया जाता था। बिना बुजुर्गो और बड़ों के बच्चों का पालन पोषण कितना कारगर होगा कहना सही नहीं। अपने संस्कृति को साथ लेकर के ही अगर हम प्रगति या परिवर्तन करे तभी इसे उचित मान सकते है।

पश्चिमी सभ्यता को ग्रहण करना कहीं अनुचित नहीं लेकिन उसके बदले अपनी सभ्यता का ही नाश कर देना किसी भी रूप मे स्वीकार्य नहीं हो सकता है। अपनी पहचान को खो देना उसी प्रकार होगा कि आप का भी कोई अस्तित्व नहीं बचेगा।

||इति शुभम्य||

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