भगवान कहाँ हैं भगवान किस तरफ हैं और भगवान क्या कर सकते हैं – कथा प्रसंग

bhagvan kahan hain

भगवान कहाँ हैं भगवान किस तरफ हैं और भगवान क्या कर सकते हैं – आज के शीर्षक से ही हम जान सकते है कि आज इस लेख के जरिये हम क्या बताने का प्रयास करेंगे। हम सब के मन में एक न एक बार अवश्य ये विचार आते ही है।

और उस परम सत्ता को लेकर ऐसे प्रश्नो का हमारे मन मशतिष्क में उत्पन्न होना स्वाभाविक है। ये हमारी बुद्धि विवेक की पहचान है कि हमारे मन मे ऐसे प्रश्न आते है। तो आज हम इन प्रश्नों का जवाब जानने का प्रयास एक कथा के द्वारा करेंगे।

एक बार की बात है किसी नगर मे एक ब्राह्मण रहता था जो कर्मकांड के जरिये अपना जीवन यापन करता था। एक समय उस राज्य के राजा ने अपने राज्य मे एक अनुष्ठान का आयोजन किया और उस ब्राह्मण को उस अनुष्ठान के पूर्णाहुति हेतु बुलाया।

राजा बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति का इंसान था। समय समय पर अनुष्ठान इत्यादि का आयोजन करता रहता था तथा ब्राह्मणों की सेवा सत्कार करता रहता था।

उस दिन भी अनुष्ठान की पूर्णाहुति उपरांत राजा ने ब्राह्मण की सेवा की उन्हे भोजन इत्यादि प्रदान किया दक्षिणा इत्यादि भी दी लेकिन कहीं न कहीं राजा के मन वो प्रश्न घूम रहा था। और उनसे रहा नहीं गया और राजा ने ब्राह्मण से पूछा की हे ब्राह्मण श्रेष्ठ कृपया मेरे प्रश्नों का जवाब दे जो मेरे मानस पटल मे बहुत दिनो से कौतूहल मचाए हुए है।

ब्राह्मण ने सोचा कि मैंने तो वेद वेदांग का पाठ किया है पता नहीं कितने शास्त्रार्थ मे भाग लिया है तो राजा के प्रश्नों का उत्तर तो दे ही सकता हूँ। और ब्राह्मण ने राजा से प्रश्न पूछने को कहा।

राजा ने अपने प्रश्न ब्राह्मण के सामने रखे कि हे ब्राह्मण देव आप बताइये कि भगवान कहाँ है, वो किस दिशा की तरफ अपना मुख किए हुए है।

और वो क्या क्या कर सकते है। राजा के इन प्रश्नों ने ब्राह्मण देव को भ्रमित कर दिया उसने सोचा इन प्रश्नो का जवाब कैसे दूँ इनके जवाब तो मुझे भी समझ नहीं आ रहे है। इन्होने मेरा इतना सत्कार किया है।

और अगर इनके प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया तो मुझे अपमानित होना पड़ेगा साथ ही साथ राजा के क्रोधित होने पर वो मुझे दंडित भी कर सकते है।

तत्पश्चात ब्राह्मण ने राजा से कहा हे राजन आपने बहुत ही बड़ा प्रश्न पूछ लिया है। इसके लिए कई ग्रंथो इत्यादि को दुबारा देखने की आवश्यकता है इस लिए आप मुझे थोड़ा समय प्रदान करें उसके बाद मै आपके प्रश्नो का उत्तर सही रूप मे दे सकता हूँ।

इसपर राजा ने बोला ठीक है मै तुम्हें पूरे एक माह का समय देता हूँ जाओ इन प्रश्नो का ऐसा जवाब इस एक महीने मे ढूंढ कर लाओ जो मुझे संतुष्ट कर सके।

एक महीने बीतने को आए लेकिन ब्राह्मण को कोई सही उत्तर नहीं मिल सका वो बहुत ही ज्यादा चिंतित था। ब्राह्मण का एक पुत्र था जो बहुत ही बुद्धिमान और विवेक शील था उसे अपने पिता की चिंता का एहसास हुआ।

और उसने अपने पिता से चिंता का विषय पूछा ब्राह्मण ने अपने पुत्र को सारा प्रसंग कह सुनाया। इस पर उसके पुत्र ने बोला बस इतनी सी बात इन प्रश्नों का जवाब मै स्वयं राजा को दूंगा आप मेरे साथ चले।

दोनों ब्राह्मण पिता पुत्र राजा के दरबार मे पहुंचे और राजा का अभिवादन कर ब्राह्मण ने बोला हे राजन आपके प्रश्नो का जवाब मेरा पुत्र देगा। इसपर राजा ने बोला ठीक है मुझे मेरे तीनों प्रश्नो का जवाब दो और मुझे अपने जवाब से संतुष्ट करो।

इसपर ब्राह्मण पुत्र ने बोला हे राजन मै आपके प्रश्नो का जवाब अवश्य दूंगा लेकिन आपके पास आए अतीति का आप सत्कार नहीं करते क्या। इसपर राजा ने क्षमा मांगी और पहले ब्राह्मण द्वय के लिए अपनी गौशाला के गाय का शुद्ध दूध पीने के लिए मंगाया।

दूध के पात्र को हाथ मे लेकर ब्राह्मण पुत्र उसमे उंगली दाल कर बार कुछ निकालने का प्रयास करने लगा। और यही क्रिया बार बार करने लगा इसपर राजा ने उससे पूछा तुम क्या करने का प्रयास कर रहे हो।

ब्राह्मण पुत्र ने बोला राजन मै दूध से मक्खन निकाल रहा हूँ पर मिल नहीं रहा। क्या दूध शुद्ध नहीं है। इसपर राजा ने बोला ऐसे कैसे मक्खन निकाल सकता है इसके लिए दूध को दहि बनाना पड़ेगा तत्पश्चात उसे मथना पड़ेगा तब जाकर मक्खन की प्राप्ति होगी।

इसपर ब्राह्मण पुत्र ने बोला आपके पहले प्रश्न का जवाब यही है। कि बहगवान हम सभी के अंदर है। हम सब उसके अंश है। और अपने ज्ञान और भक्ति के मथनी से जब हम उसे मथेंगे तब हम उन्हे देख सकते है।

उनका कोई एक नियत स्थान नहीं है। वो सार्वभौमिक है उन्हे किसी देश काल के द्वारा सीमित नहीं किया जा सकता है। राजा इस जवाब से बहुत ही संतुष्ट हुआ और अपने दूसरे प्रश्न का जवाब पूछा।

इससे ब्राह्मण पुत्र ने बोला मै आपके दूसरे प्रश्न का जवाब दूंगा उसके लिए मुझे एक दीपक की आवश्यकता है तथा इस सभागार मे अंधकार किया जाये। राजा ने वैसा ही करने का आदेश दिया इस जब दीपक अंधकार भरे सभागार मे जलाया गया तो चारो तरफ रोशनी हो गई।

ब्राह्मण पुत्र ने राजा से पूछा कि हे राजन इस दीपक का प्रकाश किस दिशा मे है तो राजन ने बोला प्रकाश तो सभी ओर है। इसकी कोई निश्चित दिशा नहीं है। इसपर ब्राह्मण पुत्र ने बोला आपके दूसरे प्रश्न का जवाब भी यही है कि भगवान किसी निश्चित दिशा मे नहीं है। बल्कि वो तो हर दिशा मे विध्यमान है उसकी नजर हर जगह है। वो सबकुछ देख रहा है।

अब बारी आई तृतीय प्रश्न के जवाब की इस पर ब्राह्मण पुत्र ने राजा से बोला कि तृतीय प्रश्न के जवाब के लिए मै चाहता हूँ कि मै आपके सिंहासन पर आसीन हूँ और आप मेरे स्थान को ग्रहण करे।

राजा ब्राह्मण पुत्र के जवाब से संतुष्ट था अतः उसने उसकी बात मान ली और दोनों ने स्थान परिवर्तित कर लिया। सिंहासन पर बैठकर ब्राह्मण पुत्र ने बोला कि भगवान यही कर सकते है कि मुझ जैसे रंक को राजा का स्थान दे सकते है। और आप जैसे राजा को रंक बना सकते है। उसके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं है।

निष्कर्ष 

राजा के ये तीन प्रश्न हम सभी के मन मे अवश्य आते है। और हमे भी इनके जवाब जानने की लालशा रहती है। जिस प्रकार ब्राह्मण पुत्र ने जवाब दिया और राजा को प्रसन्न एवं संतुष्ट किया उससे ही हम इस बात को मान सकते है जिसे हम हमेशा सौर्वभौमिक, सर्वज्ञाता एवं कर्ता धर्ता इत्यादि की उपाधि देते हुए उसका पूजन अर्चन करते आए है।

तो यही तो उसकी खूबियाँ। उन्हे किसी दिशा तक सीमित नहीं किया जा सकता है। उनकी शक्ति को सीमित रूप मे नहीं जाना जा सकता है बल्कि शक्ति भी उनही का अंश है। उन्हे किसी देश काल के द्वारा परिमित नहीं किया जा सकता है।

बस आवश्यकता है उन्हे जानने कि और इसके लिए सच्चे मन और श्रद्धा से उनकी आरधना करनी होगी और अपने कर्म और कर्तव्यों का सही से पालन करने से ही होगा।

||इति शुभम्य||

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