बच्चों के मनोरंजन की दुनिया: क्या उचित क्या अनुचित

बच्चों के मनोरंजन की दुनिया: क्या उचित क्या अनुचित- बच्चों की एक अपनी ही दुनिया होती है। न कोई चिंता न भय केवल और केवल मुस्कुराता हुआ चेहरा लिए एक मासूम। अगर हम देखे तो बच्चे जब कभी दुखी या किसी से नाराज होते है तो उसे ज्यादा देर तक अपने मन में नहीं रखते बल्कि अपना दुख और रोष प्रकट करके पुनः अपनी दुनिया में मग्न होकर विचरण करने लगते है। जबकि बड़े लोगो में विरले ही अपने दुख रोष इत्यादि को खत्म करने का गुण होता है। बाल मन बहुत ही स्वच्छ और पवित्र होता है। तो आज हम इस लेख के द्वारा जानने का प्रयास करेंगे कि बच्चों के मनोरंजन हेतु किन साधनो और वातावरण को व्यवहार में लाया जाता है। और क्या वो उचित हैं या अनुचित।

परिवेश का चयन- बच्चो के मनोरंजन हेतु हमे एक वातावरण एवं परिवेश की आवश्यकता होती है। जो कि हमारे आस पास के परिवेश पर निर्भर करता है। हम जिस भी गाँव में या शहर की किसी सोसाइटी या कॉलोनी में रहते है। प्रायः बच्चे उसी जगह के मैदान और साथियों का चयन खेलने और कूदने के लिए करते है। अतः वहाँ का वातावरण और परिवेश का असर बच्चे के मन पर होता है। बच्चे को बाहर खेलने कूदने के लिए अवश्य प्रोत्साहित करे क्योंकि इसी से उनका शारीरिक और मानसिक विकास होता है। लेकिन बच्चे के साथियों तथा जहां वो खेलते है उस परिवेश को लेकर पूर्ण संज्ञान रखे। आज कल के बच्चो को तो प्रथम प्राथमिकता में बाहरी खेल कूद हेतु प्रोत्साहित करे लेकिन अपने निगहबानी में।

आधुनिक उपकरणो का प्रयोग- आज कल के समय में प्रायः ये सुनने को मिल जाता है कि मेरा बच्चा मेरे ऑफिस से आते ही मेरा मोबाइल फोन मांग लेता है। और इसी उम्र में वो इसके सारे फंक्सन चलाने जाता है। या फिर टेलिविजन की बात करें तो बच्चे अपने उम्र के अनुसार न देखकर बल्कि सभी प्रकार के प्रोग्राम देखने लगते है। ऐसे बहुत सारे आधुनिक उपकरण है जिसका प्रयोग बच्चे आज के समय में करते है। तथा उनके मटा पिता भी इसे देखकर खुश होते है। बच्चों के माता-पिता को भी लगता है इन उपकरणो के कारण वे उसमे व्यस्त रहते है। और माता पिता बच्चों के पीछे भग्न नहीं पड़ता। लेकिन जितना हो सके इन उपकरणो से बच्चो की एक दूरी बना कर रखे एवं टेलिविजन कम्प्युटर इत्यादि का प्रयोग सीमित दायरे में रखे।

खेल इत्यादि का चयन- माता-पिता को अपने बच्चे के खेल कूद में पूरे मन के साथ जुड़ना चाहिए। उनका मित्र बन कर उनके साथ मनोरंजक पल का आनंद लेना चाहिए। ऐसे खेलो की ओर प्रेरित करना चाहिए जिससे उनका मानसिक और शारीरिक विकास हो। जैसे शतरंज, सूडोकू इत्यादि के लिए बच्चे को प्रेरित एवं प्रोत्साहित करें। बच्चों के साथ पहेलियाँ इत्यादि जैसे पुराने खेल खेलने का प्रयास करें। यदि बच्चे का मन विडियो गेम इत्यादि अनावश्यक खेल खेलने का मन करे तो उन्हे धीरे धीरे उससे अलग करे और उनके मस्तिष्क को किसी अन्य प्रेरक खेल खुद की ओर आकर्षित करें। ये सब तभी संभव हो पाएगा जब माता पिता या परिवार के सदस्य भी उनके साथ जुड़ेंगे तथा उनके खेल कूद में पूरा साथ निभाएंगे।

पुराने किस्से कहानियों और पुस्तकों की ओर प्रोत्साहन- आज के समय में भले ही यह देखने को न मिलता हो लेकिन पहले के समय में किस्से कहानियों का बहुत ही ज्यादा महत्व होता था। कई बच्चे तो ऐसे होते थे जो बगैर किस्से सुने उन्हे नींद भी नहीं आती थी। वो सारी किस्से कहानियाँ बहुत ही प्रेरणादायक होती थी। उनका हमारे मानसिक विकास में प्रभाव पड़ता था। आज कल के माता-पिता को भी अपने बच्चों में किस्से कहानियाँ सुनने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए। उनके साथ बैठकर पुस्तक पढ़ने के लिए भी प्रोत्साहित करना चाहिए। लेकिन ये सब चीजें तभी संभव है, जब हम इन सभी कामो में उनके सहभागी और साथी बनेंगे।

खेल को प्रतिस्पर्धा न बनने दे- बच्चो के खेल कूद मे शामिल हो लेकिन केवल उनका आनंद लेने के लिए। और खेल खुद को केवल मनोरंजन के रूप मे जाने उसे प्रतिस्पर्धा न बनने दे। प्रायः देखा जाता है जब बच्चा खेलता है और किसी खेल में हार जाता है तो लोग उन्हे प्रतिस्पर्धा करने हेतु प्रोत्साहित करने लगते है। लेकिन माता पिता को बच्चों में प्रतिस्पर्धा की भावना आने से बचाना चाहिए। उन्हे बताना चाहिए खेल कूद से हमे मनोरंजन का आनंद लेना चाहिए। तथा खेल कूद का उद्द्येश्य शारीरिक और मानसिक विकास करना है। फिर चाहे हम जीते या हारे। हमारा मानसिक और शारीरिक विकास दोनों ही पहलुओं में होता है।

निष्कर्ष

बच्चों की दुनिया बहुत ही रंग बिरंगी होती है। तथा उनकी रंग बिरंगी खुशहाल जिंदगी में किसी प्रकार के नियम अथवा विधान उनकी खुशहाल जिंदगी को रंगहीन बना देंगे। खेल कूद भी बच्चों के लिए अभिन्न अंग जैसा है। लेकिन इसके दुष्परिणाम से बचने के लिए हमे कुछ नियमों के तहत अपने बच्चों के मनोरंजन की दुनिया का निर्माण करना होगा। और ये तभी संभव है जब हम उनकी जिंदगी में भागीदारी लेंगे। और उनके रंग बिरंगी दुनिया का अटूट हिस्सा बनेंगे। आपका साथ पाने से बच्चों मे सकारात्मक सोच उपजेगी और किसी प्रकार के बुराइयों के संगत में आने से से भी बचेंगे। साथ ही साथ उनका शारीरिक और मानसिक विकास एक सही दिशा में आगे बढ़ेगा।

!इति शुभम्!

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