इस वर्ष अधिक मास (mal maas)- जाने क्यों आता है पुरुषोत्तम मास, मल मास और इसका महत्व-

भारतीय सनातन पंचांग के अनुसार हर तीन वर्ष के पश्चात एक मास अधिक होता है। जिसे अधिक मास, मल मास (Mal Maas) एवं पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है। इस लेख मेन हम जानने का प्रयास करेंगे कि क्यों हर तीन वर्ष पर अधिक मास आता है क्या कारण है इसके पीछे। और क्यों ये इतना महत्वपूर्ण है। इसके कई नाम क्यों इत्यादि। इस वर्ष भी अधिक मास आश्विन अधिक मास के रूप मे 18 सितंबर 2020 से 16 अक्टूबर 2020 तक योग बन रहा है। तो जानते है इसके बारे में विस्तार से।

क्यों आता है अधिक मास-

सामान्य शब्दो मे कहे तो अधिक मास के आने का कारण है तिथियो का निर्धारण। भारतीय प्राचीन पंचांग के अनुसार है तिथियो का निर्धारण 24 घंटे के आधार पर नहीं करते। बल्कि हमारी गणना चंद्रमा के चाल पर आधारित है। जो कि नक्षत्रो इत्यादि से आधारित होती है। सरल रूप से देखे तो तिथियों की गणना तीन तरह से होती है। सूर्य आधारित गणना, चन्द्र आधारित गणना, और नक्षत्र आधारित गणना। सूर्य आधारित गणना 365 दिन 6 घंटे का होता है इसीलिए अङ्ग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार 4 वर्ष पर Leap Year आता है जिसके 1 दिन की पूर्ति हेतु फरवरी माह में 1 दिन जोड़ दिया जाता है। तभी हर 4 साल पर फरवरी 29 डीनो का होता है।
इसी प्रकार चंद्र आधारित गणना के अनुसार वर्ष लगभग 354 दिनो का होता है क्योंकि चन्द्र की कलाए निश्चित नहीं होती इसीलिए कभी कभी कुछ तिथियों का लेप भी हो जाता है। केवल अक्षय तृतीया ऐसी तिथि है जिसका लोप कभी भी नहीं होता इसीलिए उसे अक्षय तृतीया कहा जाता है जिसका क्षय न हो। अतः इन 354 दिनो का अंतर बढ़ते बढ़ते 3 वर्ष में एक माह हो जाता है। और उसे ही अधिक मास के रूप में जाना जाता है।

पुरुषोत्तम मास एवं मल मास नाम का कारण-

चूंकि अधिक मास अतिरिक्त रूप में होती है इसलिए इस मास मे कोई संक्रांति नहीं होती है। अर्थात इस मास में सूर्य अपना घर परिवर्तित नहीं करता। अतः किसी भी प्रकार का पवित्र कार्य जैसे- विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश इत्यादि करना वर्जित होता है। अतः इसे मलिन मास के रूप मे जाना जाता है। और इसे मल मास के नाम से भी जाना जाता है।
अब बात करे पुरुषोत्तम मास कि तो मान्यता है जब अधिक मास को मल मास के रूप में जाना जाने लगा और सभी पवित्र कार्य वर्जित रहने लगे तो अधिक मास अपनी परेशानी लेकर विष्णु की आराधना करने लगा और उन्हे प्रसन्न कर उनसे इस संबंध मे कोई उपाय के लिए प्रार्थना की तो भगवान विष्णु ने उनसे प्रसन्न होकर उन्हे आशीर्वाद दिया ये सम्पूर्ण मास अब मुझे समर्पित माना जाएगा और इसे मेरे नाम से संबोधित किया जाएगा। तब से अधिक मास को पुरुषोत्तम मास के रूप मे पुकारा जाने लगा।

पुरुषोत्तम मास का महत्व-

चूंकि स्वयं भगवान विष्णु ने इस मास को अपनाया तो इस मास का महत्व बहुत ही ज्यादा बढ़ जाता है। मान्यता है कि पुरुषोत्तम मास मे की गई आराधन, पुजा, दान, पुण्य का लाभ 16 लाख गुना बढ़ जाता है। और अगर इस माह सभी नियमो का पालन करते हुए नर और नारायण सेवा कि जाये और भगवान पुरुषोत्तम का ध्यान वंदना की जाये तो वैकुंठ का लाभ मिलता है। और भक्तो को स्वयं भगवान विष्णु का विशेष कृपा प्राप्त होती है।

कैसे करे अधिक मास पूजन आराधना-

इस बार अधिक मास का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है क्योंकि इस वर्ष अधिक मास चतुर्मास के मध्य पढ़ रहा है।

चतुर्मास की अधिक जानकारी हेतु पढे- हरि शयनी एकादशी – चतुर्मास महात्म्य और आराधना

चतुर्मास मे हरी पूजन का विशेष महत्व है और पुरुषोत्तम मास भी प्रभु हरी को ही समर्पित है इसलिए इसका महत्व और पुण्य लाभ दुगना हो जाता है। तो अब बात करते है अधिक मास के विशेष पूजन के तरीके की। अधिक मास मे सम्पूर्ण मास प्रतिदिन सूर्योदय से पहले निद्रा का त्याग कर देना चाहिए तत्पश्चात सभी दैनिक कर्मो से निवृत्त होकर स्नान करके विष्णु आराधन करनी चाहिए। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। अथवा हरी नाम का जाप करना चाहिए।
भोजन मे तामसिक भोजन का त्याग करना चाहिए। दिन भर मन मे किसी भी तरह का विकार नहीं लाना चाइए और हरी का ध्यान मन मे रखना चाहिए।
संध्या के समय भी जब आसमान मे तारो का दिखना शुरू हो जाये और कुछ प्रकाश भी आकाश मे रहे तब शनध्य वंदन करना चाहिए दीप का घर के मंदिर में प्रज्वाललन करना चाहिए।
इसके साथ अपनी क्षमता के अनुसार पूरे अधिक मास मे कम से कम एक दिन गरीबो, ब्राह्मणो तथा जरूरतमन्द व्यक्ति को दान अवश्य करें कहते है दान और दक्षिणा का अर्पण करने से पुण्य मे बहुत ज्यादा बढ़ोतरी होती है।
इस प्रकार से अधिक मास में पूजन आराधना करनी चाहिए। किसी विशेष तैयारी की आवश्यकता नहीं बस मन मे श्रद्धा के साथ लोगो के हिट का सोचते हुए, विकारों से मुक्त होकर ईश आराधन हर समय उपयुक्त माना गया है।

निष्कर्ष-

भारतीय पंचांग पुर तरह से ग्रहो की चाल और नक्षत्रों के परिवर्तन पर आधारित रहता है। जो कि वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है। हमारी गणना बहुत ही सटीक होती है तथा तर्क संगत होती है। अधिक मास का निर्धारण भी इसी आधार पर किया गया है। तथा इसका आध्यात्मिक महत्व होते हुए तर्क संगत भी है। एक मास प्रभु विष्णु की आराधना को समर्पित किया गया है। दान पुण्य इत्यादि की मान्यता है। इसका पालन करने के बाद हमे जीवन में एक एक नई ऊर्जा का एहसास होता है। स्फूर्ति मिलती है। मन से नकारात्मक भाव समाप्त होते है सकारात्मकता का संचार होता है। और ये हमे जीवन का सही मार्ग प्रसस्त करता है। अधिक मास कि वैज्ञानिकता ये है कि यदि अधिक मास न हो तो हिजरी संवत के अनुसार हर वर्ष महीने मे अंतर होने लगता है जो कि हमारे त्योहार इत्यादि को मौसम के अनुरूप नहीं रहने देते और कभी ऐसा भी होता की होली का त्योहार ठंड के मौसम मे मनाना पढ़ता और हमारे ज़्यादातर त्योहार ऋतु आधारित है। अतः इस वर्ष आने वाले अधिक मास का अनुभव ले और इसके लाभ उठाए।

||इति शुभम्य||

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