कब होती है पूजा स्वीकार- दार्शनिक विवेचना

भारतीय संस्कृति हो या फिर कोई अन्य संस्कृति अथवा सभ्यता, पूजा पाठ और prayer की परंपरा सभी जगहों पर प्रचलित है। और लोगो का पूजा पाठ करने का उद्देश्य भी एक समान होता है।

लेकिन प्रश्न ये उठता है कि क्या सभी की पूजा ईश्वर स्वीकार करते है या फिर इसके भी कुछ मानक है। आज हम इसी बात पर चर्चा करेंगे।

क्या होती है पूजा-

सबसे पहले हम बात करेंगे कि आखिर पूजा होती क्या है तो सबसे आसान शब्दों मे बोले तो हम सभी किसी न किसी परन सत्ता मे विश्वास रखते है। और मानते है कि समस्त संसार का संचालन वो एक परम सत्ता ही करती है।

और अगर इस जीवन को सुचारु रूप से हमे संचालित रखना है तो उस परम सत्ता को याद करना उसकी कृपा प्राप्त करना अति आवश्यक है। इसी की पूर्ति हेतु हम सब पूजा के रूप मे उस सत्ता को याद करते है और इस क्रिया को अपने दिनचर्या मे समाहित करते है।

पूजा का उद्देश्य-

पूजा करने के कई उद्देश्य हो सकते है। कुछ अपनी किसी इच्छा की पूर्ति के लिये पूजा पाठ का आयोजन करते है। कुछ लोग अपने किसी कष्ट के निवारण के लिये पूजा का आयोजन करते है।

वहीं कुछ लोग पूजा को अपनी दिनचर्या का अंग मानते है और प्रतिदिन उस परम सत्ता को धन्यवाद देने के रूप मे पूजा पाठ करते है।

पूजा की स्वीकार्यता-

ये आवश्यक नहीं कि ईश्वर सभी के पूजा को स्वीकार्य करे। क्योंकि यहा कुछ मानक है जिनके आधार पर ही माना जा सकता है कि आप की पूजा स्वीकार होगी कि नहीं और इन मनको को जानना अति आवश्यक है। इनमे से कुछ मानक इस प्रकार से है।

मन की शुद्धता-

भारतीय सनातन परंपरा के अनुसार हम कभी भी पूजा का आयोजन करने से पहले स्नान इत्यादि के द्वारा और स्वच्छ वस्त्रों को धारण करके ही पूजा आरंभ करते है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है मन की शुद्धता मन की शुद्धता से तात्पर्य है मन मे किसी प्रकार के गलत विचार गलत भाव और किसी के प्रति द्वेष इत्यादि की भावना नहीं होनी चाहिए।

मन की शुद्धता कैसे रखे और मन की मलिनता किसे कहते है इसके लिये आप हमारा एक अन्य लेख पढ़ने के लिये क्लिक करे।

किसी की हानि के उद्देश्य से पूजा-

कभी भी हमे किसी की हानि के लिये पूजा का आयोजन बिलकुल भी नहीं करना चाहिए हमे कोई अधिकार नहीं है किसी के जीवन को बिगड़ने का अगर किसी ने आपका अहित सोचा है। तब भी अगर पूजा का आयोजन अरे तो अपने हित के लिये न कि जिसने आपकी हानि की उसके अहित के लिये पूजा का आयोजन करे।

बिना किसी इच्छा की पूजा सर्वोत्तम-

प्रायः लोग जब पूजा पाठ का आयोजन करते है या फिर किसी मठ मंदिर मे जाते है तो उनके मन मे कोई न कोई इच्छा अवश्य होती है लेकिन वो पूजा ज्यादा श्रेष्ठ होती है जो बिना किसी इच्छा पूर्ति के उद्देश्य के हो।

आप अपनी परेशानियाँ या फिर अड़चनों के बारे मे ईश्वर से प्रार्थना अवश्य करें लेकिन किसी इच्छा की पूर्ति की मांग करना उचित नहीं होता है।

क्योंकि मान्यता है कि ईश्वर हम सबके हित के बारे मे जानते है और वो कभी भी हमारा अहित नहीं करते जो कुछ भी बुरा यदि हमारे जीवन मे घटित हो रहा है वी हमारे पूर्व जन्मों के फल के कररण ही हो रहा है।

पूजा की स्वीकार्यता पर प्रसंग-

एक बहुत ही अच्छा प्रसंग है रामायण का जिसमे मेघनाद और भगवान राम और रामायण तीनों ही अपने विजय के लिये अपने अपने इष्ट का पूजन करते है। लेकिन अंत मे विजय होती है श्री राम की।

और इसके पीछे का कारण यही है कि तीनों आराधन और पूजन मे उनके उद्देश्य के अनुसार ही उनकी पुजा स्वीकार्य हुई।

एक तरफ भगवान श्री राम ने अपनी पूजा की जिसमे उन्होने केवल उस युद्ध पर विजय की चाह रखी जिससे वो अपने पत्नी माता सीता को रावण के कैद से मुक्त करा सके। वही रावण और मेघनाद की पूजा युद्ध विजय की तो थी।

लेकिन जिसके पूर्ति के उपरांत उनके गलत कर्मो को बढ़ोत्तरी मिलती इसलिए सच्चे मन और सच्चे उद्देश्य के कारण भगवान राम की पूजा सफल हुई और युद्ध मे उनकी विजय हुई।

पूजा मे ईश्वर से विनिमय करना अनुचित-

आज कल देखने को मिलता है हम अपनी किसी इच्छा पूर्ति हेतु जब ईश्वर की पूजा अर्चना करते है तो उनसे हम एक प्रकार का विनिमय करते है। लेकिन ये कहाँ तक उचित है हमे खुद ही सोचना चाहिए।

हम प्रायः ईश्वर की आराधना के समय जब कोई इच्छा रखते है तो उन्हे कुछ अर्पण करने का शर्त भी रखते है। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि जिस परम सत्ता के अधीन हम जीवन जी रहे है उन्हे हम क्या अर्पण कर सकते है।

उदाहरण के स्वरूप जब हम अपने माता पिता के अधीन जीवन जीते है और जब हमारे माता पिता हमारे जरूरतों को पूरा करते है तो क्या बदले मे हम उन्हे कुछ देते है उसी प्रकार से समझना चाहिए जब हम ईश्वर से अपने पीडा दुख दर्द के निवारण की बात करते है तब हमे भी बदले मे कुछ देने की बात कहना उचित नहीं माना जाना चाहिए।

निष्कर्ष-

पूजा अर्चना आराधना ये सब कुछ केवल और केवल उस परम सत्ता को याद करने का माध्यम मात्र है उनके बताए मार्ग और सत्य, अनुशासन, ईमानदारी इत्यादि सदगुणो का पालन करने मात्र से भी हम ईश्वर को सच्चे रूप मे कुछ न कुछ अर्पण ही करते है।

ईश्वर केवल भक्ति भाव, श्रद्धा के भूखे है। उनके द्वारा बताए अनुसार समाज के हित के बारे मे सोचना अपने कर्म के प्रति ईमानदारी अनैतिक कर्मों के प्रति भय और ईश्वर के बताए मार्ग पर आगे बढना ही सही मैने मे ईश्वर की सच्ची पूजा और अर्चना है।

परम सत्ता के अधीन हम सभी प्राणी उनको याद करके उनके बनाए सम्पूर्ण जगत मे प्रेम, सद्भाव का प्रचार प्रसार करे। ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, अनैतिक कृत्यों से दूरी बनाए रहे और उस ईश्वर का ध्यान अपने मन मस्तिष्क मे रखे।

और ईश्वर की पूजा अर्चना को अपनी दिनचर्या मे उनको एक बार सच्चे मन और श्रद्धा विश्वास से याद करे यही सच्ची पूजा है को स्वीकार होगी।

||इति शुभम्य||

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