आशीर्वाद क्या है, सनातन धर्म मे क्या है इसकी महत्ता

आशीर्वाद क्या है, सनातन धर्म मे क्या है इसकी महत्ता

सनातन धर्म मे आशीर्वाद को उस अवयव के रूप मे देखा जाता है जो हमारे जीवन की बाधाओं परेशानियों को दूर करती है। हमारे समाज मे अपने से बड़े को नमस्कार एवं प्रणाम करने के उपरांत बड़ों द्वारा आशीर्वाद लेने की परंपरा है।

आशीर्वाद दो शब्दो आशीष और वाद के संधि से बना है। जिसके अनुसार छोटों के अभिवादन के उत्तर के रूप मे बड़ों द्वारा आशीष प्रदान किया जाता है।

समाज मे जो कोई भी पद, प्रतिष्ठा एवं आयु इत्यादि के आधार पर हमसे बड़ा होता है उनका हम अपना सिर झुका कर अभिवादन करते है। और उनके द्वारा हमे जीवन मे आगे बढ्ने हमारी उन्नति होने इत्यादि स्वरूपों मे आशीष प्रदान किया जाता है।

किनसे प्राप्त करना चाहिए आशीष-

वैसे तो हमारे समाज मे हर कोई जो हमसे किसी भी रूप मे बड़ा हो उससे आशीष प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन कुछ लोगो का वर्णन अति आवश्यक है जिनसे हमे अवश्य ही आशीष प्राप्त करना चाहिए। जो कि इस प्रकार से है।

ईश्वर-

सनातन धर्म के अनुसार इस समस्त सृष्टि के रचयिता इसके पालन कर्ता और संहारक तीनों ही कार्य स्वयं ईश्वर के द्वारा किया जाता है। अद्वैत वेदांतियों के द्वारा बताया गया है कि इस संसार की समस्त अवयव किसी न किसी रूप मे उस ईश्वर का ही अंश है।

चूंकि हम सब उस ईश्वर की कृपा से अपने जीवन का आनंद ले पा रहे है तो कहीं न कहीं हमे उनकी कृपा की आवश्यकता अवश्य ही रहती है। और इसी कारण से उनके आशीर्वाद के बगैर हमारे जीवन मे कई अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है।

माता पिता-

ईश्वर के आशीष के उपरांत सबसे प्रमुख रूप से किसी का स्थान है हो हमे इस भौतिक जीवन का अनुभव करने वाले हमारे जन्मदाता हमारे माता और पिता।

कई जगहों पर तो ये भी वर्णन है कि दृश्यमान रूप मे हमारे माता पिता ही भगवान का कार्य करते है और इस जगत मे वही हमारे जीवन की समस्त जिम्मेदारियाँ संभालते है।

अतः उनके आशीर्वाद के बगैर ईश्वर भी हमसे प्रसन्न नहीं हो सकते है। जिस घर मे माता पिता का अनादर हो वहाँ ईश्वर भी वास नहीं करते है।

अतः ईश्वर की अर्चना के उपरांत हम सभी को माता पिता की सेवा और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का लाभ अवश्य ही ग्रहण करना चाहिए जिससे हमारे जीवन की बाधाओं से लड़ने के लिए हमे शक्ति प्राप्त होगी।

गुरु-

तृतीय सबसे प्रमुख जन हैं हमरे गुरु इनका सम्मान और इनके आशीर्वाद से हम अपने जीवन मे बहुत ही आगे बढ़ सकते है। एक गुरु अपने शिष्य के विवेक को जागृत करता है उसके आध्यात्मिक और भौतिक ज्ञान को जागृत करता है।

और गुरु की कृपा से ही एक व्यक्ति समाज मे मान सम्मान प्राप्त करने योग्य बनता है अतः गुरु के आशीर्वाद के बगैर एक व्यक्ति के उन्नति के बारे मे सोचना व्यर्थ है।

गुरु द्वारा प्राप्त ज्ञान न तो चोरी हो सकता है और न ही नष्ट और इस ज्ञान के द्वारा हम समाज मे सही मार्ग का चयन करके अपने जीवन को अच्छा बना सकते है।

उपरोक्त तीन जनो के अलावा हमे अपने से बड़े, बुजुर्गों और संत महात्मा और ज्ञानी के आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए लेकिन इन तीनों का वर्णन इस लिए करना आवश्यक है, क्योंकि ये तीन स्वरूप कभी भी हमारा अहित नहीं सोच सकते है, ये हमेशा हम पर अपनी कृपा बनाए रखते है। जो कि हमे जीवन के हर मोड पर सहयोग प्रदान करती है।

आशीर्वाद की महत्ता-

आशीर्वाद के जरिये हम अपने भाग्य को भी बदल सकते है। जीवन मे आने वाली अड़चनें हमारा अहित नहीं कर पाएँगी। इसी आशीर्वाद की महत्ता को समझने के लिए हम एक कथा प्रसंग के जरिये समझने का प्रयास करेंगे।

एक समय की बात है किसी राज्य का एक राजा हुआ करता था। राजा और उनकी पत्नी बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे। ईश्वर की कृपा से उन्हे कोई भी कमी नहीं थी न तो उनके राज्य मे और न ही उनके नागरिकों को कोई समस्या थी।

लेकिन एक परेशानी राजा और रानी को मन ही मन हमेशा कचोटती रहती थी। शादी के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी राजा की कोई संतान नहीं थी। इसको लेकर दोनों और उनकी प्रजा बहुत ही ज्यादा चिंतित थे।

राजा ने बहुत ही बड़े बड़े ज्योतिषियों से सलाह ली कई विद्वानो, वैद्यों इत्यादि से अपनी समस्यान बताई लेकिन कोई भी हल प्राप्त नहीं हुआ।

अंत मे राजा और रानी ने ईश्वर की तपस्या करने की ठानी और वो दोनों राजमहल का त्याग कर समस्त कार्य भार अपने मंत्री समूह को सौंप कर वन की तरफ निकल पड़े। और घोर तपस्या मे तल्लीन हो गए।

राजा रानी को पुत्र प्राप्ति का वर-

बहुत दिनों बाद राजा की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं ब्रह्मा प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। राजा और रानी ने अपनी इच्छा ब्रह्मदेव के सामने प्रकट की।

इसपर ब्रह्मा ने बोला आपके भाग्य मे संतान प्राप्ति के कोई भी लक्षण नहीं है लेकिन आप लोगो की तपस्या से मई प्रसन्न हूँ अतः आप को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी लेकिन वो केवल आठ वर्ष की आयु तक ही जीवित रहेगा। और ये वरदान देकर ब्रह्मा अंतर्ध्यान हो गए।

राजा रानी अपने राजमहल मे वापस आए उनके मन मे बहुत ही हर्ष था कि उनके घर संतान आएगा साथ ही साथ मन ही मन दुखी भी थे कि केवल 8 वर्ष के लिए ही संतान का सुख भोग सकते है।

पर अपने चिंता को उन्होने समय आने पर देखने की बात छोडकर बच्चे के बारे मे सोचना शुरू कर दिया। समय बीतने के उपरांत राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। और उन्होने उसको अपने ही तरह सात्विक विचार प्रदान किए।

ध्यान पूजा और अर्चना का पाठ सिखाया साथ ही साथ राजा ने अपने पुत्र को सभी बड़ों का आशीर्वाद लेने की आदत को विकसित कर दिया।

राजकुमार को शतायु का वरदान-

उनका पुत्र जिस किसी बड़े जन को देखता उनके पैर को छूकर उनसे आशीर्वाद लेता। देखते देखते बच्चे का आठवा वर्ष आने को हुआ। बच्चे मे हमेशा से अच्छे गुण थे वो सभी बड़ों का आशीर्वाद लेता था।

ईश्वर आराधना करता था। इधर यम देव भी बच्चे का प्राण हरण करने के लिए यमलोक से धरतीलोक के लिए निकले, वहीं दूसरी तरफ त्रिदेव ने भी उसी समय धरती लोक के विहार का मन बनाया और निकाल पड़े।

त्रिदेव उसी नगर मे पहुंचे और उन्होने मुनियों का भेष बना रखा था। राजा के बच्चे का जो गुण था उसी के अनुरूप उसने त्रिदेवो को देखा और जाकर उनके पाँव छूए। और सहसा ही भगवान शिव के मुख से आशीर्वाद निकला कि चिरंजीवी भव।

और इसी आशीर्वाद ने उस बालक के आयु को बढ़ा दिया जब यम देव ने उस बालक के प्राण हरने हेतु अपना यम पाश फेंका तो वो उस बालक को छू भी नहीं पाया तब यमदेव तीनों देवो के पास पहुंचे और यम पाश के कार्य न करने की बात बताई।

इसपर ब्रह्मदेव ने बताया अब उस बालक के शतायु जीवन को कोई भी खत्म नहीं कर सकता क्योंकि आज भ्रमण के समय स्वयं शिव ने उसे शतायु होने का आशीर्वाद प्रदान कर दिया है। और इस प्रकार राजा रानी अपने पुत्र के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगे।

निष्कर्ष

आशीर्वाद के महत्व को हम नकार नहीं सकते है। उपरोक्त कथा प्रसंग के अलावा ऐसे कई प्रसंग है जिनके द्वारा हमने लोगो के भाग्य को आशीर्वाद के जरिये बदलते देखा है।

चाहे वो सती सावित्री की कहानी हो जिन्होने यम देव के आशीर्वाद के जरिये अपने पति के प्राणों को वापस प्राप्त कर लिया हो या कोई अन्य कथा। आज के वर्तमान समय मे भी बहुत सारे ऐसे प्रसंग देखने को मिल जाएँगे जहां आशीर्वाद के कारण बहुत कुछ अच्छा होने के लक्षण दिखते है।

अतः इस आशीर्वाद की परंपरा का हम सबको पालन करना चाहिए और जीवन मे आ रही बाधाओं के प्रकोप से बचने की शक्ति प्राप्त करनी चाहिए।

||इति शुभम्य||

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