हितोपदेश: आलसी ब्राह्मण की कहानी

आलसी ब्राह्मण की कहानी- एक समय की बात है। किसी गाँव में एक ब्राह्मण परिवार रहता था। वो परिवार बहुत ही खुशहाली में अपना जीवन बसर करता था। उनके पास सभी भौतिक संसदहन मौजूद थे। परिवार भी भरा पूरा था एवं परिवार में किसी प्रकार की कोई कमी नहीं थी। केवल उस परिवार का जो मुखिया था उसमे आलस्य भरा हुआ था। पूरी दिन वो आलस्य के आगोश में रहता था।

जिसे देखकर उसकी पत्नी और परिवार के सदस्य दुखी रहते थे। एक बार एक साधु उस गाँव मे आए और वो ब्राह्मण के घर भोजन करने गए। ब्राह्मण ने बड़े ही सत्कार के साथ साधु की सेवा की। हर प्रकार से ब्राह्मण ने साधु को प्रसन्न कर दिया। जिससे साधु ने ब्राह्मण से वरदान मांगने को बोला। चूंकि ब्राह्मण आलसी था तो उसने एक सेवक की मांग की जो उसके सारे काम कर दिया करे। जिसपर साधु ने एक प्रेत ब्राह्मण को भेट किया जो उसके सारे काम करेगा। लेकिन एक शर्त भी राखी कि उसका काम खत्म होने से पहले उसे दूसरा काम देना पड़ेगा वरना वो इसे खा जाएगा। और साधु, ब्राह्मण को प्रेत सौप कर चले गए।

ब्राह्मण अपने सभी कामो के लिए प्रेत को पाकर बहुत खुश हुआ। तुरंत ही प्रेत ने काम बताने के लिए बोला। ब्राह्मण ने बोला की अभी उसके पास कोई काम नहीं प्रेत ने बोला जैसा कि नियम था अगर मुझे काम नहीं दिया गया तो मै तुम्हें खा जाऊंगा। ब्राह्मण डर के मारे उसे खेतों में पानी डालने के लिए भेज देता है। और चैन कि सांस ली। प्रेत बहुत जल्दी से दिया हुआ काम कर के वापस आ जाता है। और अगले काम की मांग करने लगता है। ब्राह्मण भय में आ जाता है कि अगर दूसरा काम नहीं दिया तो वो मुझे खा जाएगा। और कोई काम देकर अपनी पत्नी के पास उपाय हेतु जाता है।

पत्नी उसका बचाव करने को तैयार हो जाती है। लेकिन ये शर्त रखती है कि उसे अपने जीवन से आलस्य का परित्याग करना होगा। और अपने समस्त काम बिना किसी आना कानी के पूरे मन के साथ करने होंगे। ब्राह्मण इस बात पर तैयार हो जाता है। उसी समय प्रेत भी दिया हुआ काम करके वापस आ जाता है। और अगले काम की मांग करने लगता है।

इस पर ब्राह्मण बोलता है कि इस बार तुम्हें काम मेरी पत्नी देगी। और उसे समय से पूरा करना है। ब्राह्मण की पत्नी उसे घर के कुत्ते की पुंछ सीधी करने का काम देती है। प्रेत इस काम को पूरा करने के लिए लग जाता है परंतु वह कुत्ते की पुंछ सीधी नहीं कर पता है। और ब्राह्मण की जान बच जाती है। और अगले दिन से ब्राह्मण आलस्य का परित्याग कर देता है और अपने सभी कामों को बड़े मन से करने लगता है।

शिक्षा

इस कहानी से हमे दो प्रकार की शिक्षा मिलती है। एक आलस्य हमारे जीवन में जहर के समान है। दूसरा अपनी सूझ बूझ से व्यक्ति किसी भी प्रकार की विपत्ति से बाहर निकल सकता है। सर्वप्रथम पहली शिक्षा की बात करे तो ब्राह्मण अगर आलस्य के शरण में नहीं रहता तो वो कोई उपयोगी वरदान की मांग करता। लेकिन आलस्य ने उसकी बुद्धि को भी भ्रष्ट कर रखा था जिससे उसने इस प्रकार का वरदान मांगा जिससे उसकी जान खतरे में आ गई।

यानि कहा जा सकता है की आलस्य मनुष्य को इस तरह बना देती है कि वो एक वरदान को भी अभिशाप में परिवर्तित कर देता है। दूसरी शिक्षा उसकी पत्नी की सूझबुझ को देखकर प्राप्त होती है। अगर व्यक्ति अपने सूझ बुझ का सही इस्तेमाल करे तो वो आते हुए काल को भी मार्ग से विचलित कर सकता। बुद्धि विवेक ही एक ऐसा हथियार है जिसके द्वारा हम अपने और अपने आस पास आती हहुई विपत्तियों से निपट सकते है। साथ ही साथ बुद्धि के द्वारा ही हम अपना जीवन सुलभ बना सकते है। उदाहरण स्वरूप देखे तो ब्राह्मण की पत्नी ने अपने बुद्धि विवेक के बल पर अपने पति पर आयी विपत्ति को टाल दिया साथ ही साथ उसके अंदर व्याप्त आलस्य को भी खत्म करने का वादा ले लिया।

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