भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त थी 16 कलाएं (विद्याएँ): क्या है इनका रहस्य

16 kalayen

प्राचीन काल मे गुरुकुल पद्धति के अनुसार शिक्षा प्रदान की जाती थी। और इसमे सबसे प्रमुख 16 विद्याओं का बहुत ही महत्व था। यहाँ तक मान्यता थी जो विद्यार्थी अपने गुरु से 16 विद्याओं मे निपुणता प्राप्त कर लेता था उसे ब्रह्मपुरुष की पदवी प्राप्त होती थी। चूंकि आज जनमाष्टमी का महापर्व है तो बरबस इस लेख का विचार आया। क्योंकि मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण एक मात्र अवतारी पुरुष माने जाते है जिन्होने 16 कलाओं अथवा विद्याओं मे निपुणता प्राप्त की थी। और ये भी कहा जाता है कि स्वयं भगवान श्री राम ने इनमे से केवल 12 विद्याओं की ही शिक्षा प्राप्त की थी। तो आइये इस लेख के द्वारा जानने का प्रयास करते है कि कौन कौन सी थी वो 16 कलाएं (विद्या) और उनकी क्या विशेषताएँ थी।

प्रथम श्री- पहली कला अथवा विद्या को श्री के नाम से जाना जाता है। श्री का शाब्दिक अर्थ होता है सम्पदायुक्त अथवा वैभवयुक्त। लेकिन इस विद्या का अर्थ भौतिक रूप से सम्पदायुक्त होना नहीं बल्कि जो पुरुष आत्मिक अथवा मानसिक रूप से वैभवयुक्त हो। जिसके विचारों जिसके व्यवहार, जिसके आचरण मे कोई कमी न हो यानि जो विचारों, आचरण इत्यादि से सम्पदा युक्त अथवा श्री युक्त हो उन्हे ही प्रथम कला से निपुण माना जा सकता है।

द्वितीय भू- भू का शाब्दिक अर्थ होता है। अचल संपत्ति अथवा पृथ्वी से और इस कला से परिपूर्ण व्यक्ति से तात्पर्य है। जो इस धरती पर नियंत्रण रखने की क्षमता रखता हो या फिर इस धरती के समस्त अधिभारों को व्यवस्थित रखने की क्षमता रखता हो। या फिर सामान्य शब्दों मे कहे तो जो व्यक्ति इस धरती पर सही रूप मे राज करने की क्षमता रखता हो या फिर यहाँ की प्रजातियों के भरण पोषण उनके सुख सुविधाओं का ख्याल रख सके वही इस द्वितीय कला अथवा विद्या का असली निपुण व्यक्ति माना जा सकता है।

तृतीय कीर्ति- तृतीय कला का शाब्दिक अर्थ है यश, मान सम्मान। इसका तात्पर्य है जो व्यक्ति अथवा पुरुष सभी जनों द्वारा सम्मान का भागीदार हो। जो गुणगान और बखान समस्त जन करे तथा जो अपने आचरण और व्यवहार के कारण सभी नर नारियों और जीवों द्वारा पूजनीय, सम्मानीय माना जाता है। जिसके प्रति हर किसी को श्रद्धा का भाव उत्पन्न हो जिससे हर कोई आशा का भाव रखता हो। वही व्यक्ति असल मे तृतीय कला अथवा विद्या मे निपुण व्यक्ति माना जा सकता है।

चतुर्थ इला- इला का शाब्दिक अर्थ है वाणी, सरस्वती, बुद्धिमता इत्यादि। अर्थात जिस किसी व्यक्ति मे वाणी की शक्ति होती है। जो व्यक्ति अपनी वाणी के जरिये सभी को सम्मोहित करने की क्षमता रखता हो। या जो व्यक्ति अपने वचनो के जरिये किसी को भी अपने वश मे कर ले उसमे चतुर्थ कला अथवा गुण इला विद्यमान है। हम प्रायः बहुत सारे ऐसे व्यक्ति के वाणी से सम्मोहित हो जाते है। उनकी वाणी मे इतनी मधुरता और सम्मोहन व्याप्त होता है कि उनके कहे को हम कभी भी नकार नहीं सकते। इस गुण से परिपूर्ण व्यक्ति ही इला की विद्या अथवा कला मे निपुण माना जाता है।

पंचम लीला- लीला को सही अर्थ मे परिभाषित करमे हेतु हमे दर्शन को समझना होगा जिस व्यक्ति के जीवन दर्शन से हम सभी को कोई न कोई प्रेरणा मिले। अथवा जो अपने दर्शन के द्वारा हम सभी को सही मार्ग का पथ प्रदर्शन करे। या फिर सामान्य भाषा मे बोले जिसकी लीलाओं या कलाओं के द्वारा हमे जीवन आदर्श की प्राप्ति हो जो हमे अपनी लीलाओं के द्वारा उत्तम मार्ग की ओर प्रेरित करे। वही व्यक्ति पंचम कला अथवा विद्या लीला मे निपुण माना जाता है।

षष्टम कान्ति- छठी कला अथवा विद्या है कान्ति। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है आभा। आभा से तात्पर्य आकर्षण से है। यानि जिस व्यक्ति के मुख से वो आकर्षण झलक रहा हो। अथवा जिसके दर्शन मात्र से हम उसके प्रति आकर्षित हो जाये उसमे कान्ति विद्यमान होता है। और ये कान्ति केवल मुख मण्डल तक ही नहीं बल्कि उसके सम्पूर्ण आचरण व्यवहार को प्रदर्शित करता हो। जो अपने आचरण व्यवहार और दर्शन मात्र से किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता रखता हो उस व्यक्ति मे छठी कला अथवा विद्या कान्ति विद्यमान रहता है।

सप्तम विद्या- सप्तम कला है विद्या जिसे हम बुद्धि के रूप मे भी जानते है। जिस व्यक्ति मे ऐसे गुण हो कि समस्त बाधाओं को अपनी बुद्धि से समाप्त कर दे। जिसकी बुद्धि का कोई भी विकल्प न हो। समस्त संसार जिसकी बुद्धि अथवा मेधा का लोहा माने। जो अपनी बुद्धि के बल पर कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए डगमगाये न। जो अपनी बुद्धि के द्वारा समस्त लोक और जन का कल्याण और हित के बारे मे सोचे। उस व्यक्ति को सप्तम कला अथवा गुण मे निपुण माना जा सकता है।

अष्टम विमला- आठवि महाविद्या अथवा कला है विमला। विमला शब्द का शाब्दिक अर्थ है शुद्ध, पवित्र, निर्मल, सफ़ेद इत्यादि। इस शब्द से तात्पर्य है। जो व्यक्ति किसी भी तरह के छल कपट से दूर रहे। जिसके विचारों मे सबके प्रति तटस्थता हो जो मन को नियंत्रित रखते हुए छल कपट से दूरी बना कर रखे। जिसमे पक्षपात की भावना का तनिक भी नाम न हो। जो किसी एक वर्ग का न सोचकर समस्त वर्गों के हित की बात करे। ऐसे व्यक्ति को अष्टम कला अथवा गुण विमला मे निपुण माना जा सकता है।

नवम उत्कर्षिणि- नवम कला अथवा वैध्य का शाब्दिक अर्थ है। जो लोगो को प्रेरित करने वाला हो। जिसमे परिवर्तन लाने की क्षमता हो। अर्थात ऐसा व्यक्ति जिसमे किसी को भी प्रेरित करने की शक्ति हो जो किसी को भी अपने कहे अनुसार कर्म करने हेतु उत्साहित कर सके जो समाज, वर्ग इत्यादि मे किसी अच्छे प्रयोजन हेतु परिवर्तन करने की शक्ति रखता हो। जिस प्रकार से श्री कृष्ण ने अर्जुन को प्रेरित किया और महाभारत युद्ध के द्वारा असत्य के साम्राज्य को नष्ट कर परिवर्तन लाया। उसी प्रकार इस प्रकार के गुणो वाले व्यक्ति को नवम कला मे निपुण माना जा सकता है।

दशम ज्ञान- दशम कला को ज्ञान के रूप मे जानते है। इसे हम कुछ शब्दों के द्वारा व्याख्या नहीं कर सकते लेकिन अगर ज्ञान को कम शब्दों के जरिये सही रूप से जानना है। तो हमे हंस से इसकी प्रेरणा ले सकते है। जिसमे नीर क्षीर विवेक के गुण के द्वारा हम ज्ञान को अच्छे से और कम शब्दों मे परिभाषित कर सकते है। जिस प्रकार से एक हंस धूध मे व्याप्त पानी को अपने नीर क्षीर विवेक के कारण पृथक कर सकता है। उसी प्रकार ज्ञान हमे किसी भी प्रकार के सत असत, नीति अनीति इत्यादि मे अंतर अथवा भेद को जान सकते है। और नीर क्षीर विवेक से परिपूर्ण व्यक्ति ही दशम विद्या अथवा कला मे निपुण माना जा सकता है।

एकादश क्रिया- भगवान श्री कृष्ण का सम्पूर्ण गीता का ज्ञान ही क्रिया अथवा कर्म के सिद्धान्त पर आधारित है। और क्रिया अथवा कर्मण्यता का गुण हर व्यक्ति एवं जीव मे विद्यमान होना चाहिए चाहे वो कोई भी क्यों न हो। जिस पुरुष मे अथवा जीव मे क्रिया का गुण न हो उसे हम जीवित जीव की श्रेणी मे भी नहीं रखते। तथा अपने कर्म मे निष्काम भाव का विद्यमान होना उस क्रिया के गुण को और भी सार्थकता प्रदान करता है। इस प्रकार से जिस किसी व्यक्ति मे क्रिया अथवा कर्म का गुण विद्यमान होता है उसे एकादश विद्या अथवा कला मे निपुण माना जाता है।

द्वादश योग- योग का अर्थ बहुत ही विस्तारित है। और वर्तमान समय के योग से हम इसको समझ नहीं सकते। इस योग विद्या से तात्पर्य परम सत्ता से जुड़ाव से है। तथा उस परम सत्ता के असली स्वरूप को पहचानने से है। हम अपनी आत्मा पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर उस परम सत्ता से अपनी आत्म का साक्षात्कार कराने की क्रिया को ही असली योग के रूप मे देखते है। और वर्तमान समां के केवल शारीरिक श्रम के योग व्यायाम से इसकी तुलना करना बहुत ही गलत होगा। अतः जो व्यक्ति योग क्रिया मे निपुण हो जिसे आत्मनियंत्रण का ज्ञान प्राप्त हो उसे द्वादश कला अथवा विद्या मे निपुण व्यक्ति कहा जाता है।

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त्रयोदश प्रहवि- इस शब्द का कई अर्थ है। इसे विनय, शिष्टता, सुशीलता इत्यादि कई रूप मे जाना जाता है। जिस मनुष्य मे ये गुण विद्यमान होते है। अर्थात कोई व्यक्ति कितने भी उच्च पद पर विद्यमान हो लेकिन उसमे सुशीलता विद्यमान रहे उसके तनिक भर भी अहंकार न हो। वो कर्ता होते हुए भी सभी को समान भाव से देखे तथा स्वयं को भी बकियों से उच्च न माने। जैसे एक शुशील राजा मे वो गुण हो कि वो राजा होते हुए भी सभी जन को प्रेम भाव से देखे उसके अंदर किसी भी प्रकार का अहंकार की भावना न हो तो ऐसे व्यक्ति मे तेरहवे विद्या अथवा कला का गुण विद्यमान होता है।

चतुर्दश सत्य- सत्या को परिभाषित करने की आवश्यकता है। जो कुछ भी व्याप्त है। वो सत्या है। जो कुच्छ भी उचित है अथवा नीति के अनुरूप है वो सत्य है। सत्य किसी सीमित परिभाषा नहीं। ये व्याप्त, स्थापित का ही द्वितीय नाम है। सत्य वो है जो न तो अडिग है और ना ही देश काल परिस्थिति के अनुरूप परिवर्तनीय है। और जिस किसी व्यक्ति अथवा जीव मे ये गुण विद्यमान है उसमे सत्य की कला की निपुणता भी विद्यमान है।

पंचदश इसना- इसना का शाब्दिक अर्थ है आधिपत्य, प्रभुत्व इत्यादि। जो भी व्यक्ति अपना प्रभत्व स्थापित करने का गुण रखता हो। जिसका आधिपत्य सर्वज्ञ हो। जिसे सर्व जन का कर्ता धर्ता माना जा सके जिसमे ऐसे गुण हो कि वो सभी जनों के कल्याण का अधिकार रखता हो ऐसे व्यक्ति मे पंचदश गुण, विद्या अथवा कला इसना का गुण विद्यमान होता है। ये गुण बताते है कि व्यक्ति किसी समाज विशेष से बंधा हुआ नहीं बल्कि सर्व समाज मे उसकी मान्यता स्थापित मानी जा सकती है।

षोडश अनुग्रह- सोलहवीं और अंतिम कला केवल ईश्वर या फिर जो व्यक्ति ईश्वर समान हो उसमे हो व्याप्त हो सकती है। अनुग्रह से तात्पर्य उस गुण से है जिसमे कोई व्यक्ति समस्त जगत को अपना मानते हुए उसके कलयन और हित के बारे मे सोचता है। और समय आने पर उनके हितों की रक्षा भी करता है। जिसमे सर्व जन के उपकार की भावना हो जिस प्रकार ईश्वर किसी भोग इत्यादि के इच्छुक न होकर बल्कि भक्त के भाव के भूखे होते है और उसका कल्याण करते है। ऐसे गुणों से परिपूर्ण व्यक्ति ही सोलहवीं कला मे निपुण माना जाता है।

निष्कर्ष 

उपरोक्त सोलह कलाए हमे जीवन आदर्श भी सिखाती है। हममे इतनी क्षमता तो नहीं हम इन कलाओं मे निपुण हो सके लेकिन अपनी क्षमता के अनुसार इन कलाओं के द्वारा जिस तरह के आचरण और व्यवहार की कल्पना की गई है। उन्हे अपने जीवन मे अनुशरण अवश्य ही करना चाहिए। और इसी मार्ग का अनुशरण करते हुए जन कल्याण और हित की ही बात करनी चाहिए। निपुणता न सही लेकिन उपरोक्त कलाओं को व्यवहार मे लाते हुए सत्य, विवेक, ज्ञान, क्षमा, शालीनता इत्यादि जैसे गुणो को अपने जीवन मे अवश्य धरण करना चाहिए।

||इति शुभम्य|| 

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